'भारत को एनपीटी में जगह नहीं'

Image caption गैरेथ एवन्ज़ परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण पर अंतरराष्ट्रीय आयोग के सह अध्यक्ष हैं.

परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण पर अंतरराष्ट्रीय आयोग के सह अध्यक्ष गैरेथ एवन्ज़ ने कहा है कि भारत, पाकिस्तान और इसराइल को परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में एनपीटी में शामिल नहीं किया जाएगा.

बीबीसी हिंदी को दिए ख़ास इंटरव्यू में एवन्ज़ ने कहा कि मई 2010 में एनपीटी के समीक्षा सम्मेलन में संगठन इस मामले में अहम रिपोर्ट पेश करेगा.

गैरेथ एवन्ज़ ऑस्ट्रेलिया और जापान के प्रधानमंत्रियों द्वारा पिछले साल बनाए गए आयोग के सह अध्यक्ष हैं.

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि कोई भी सदस्य देश भारत, पाकिस्तान और इज़राइल को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र के रूप में एनपीटी में शामिल करने की मंज़ूरी नहीं देगा और निश्चित तौर पर ये तीनों देश भी निशस्त्रीकरण के समर्थक देशों के संगठन में शामिल नहीं हो रहे हैं. ये सबसे बड़ा गतिरोध है.”

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विदेश मंत्री ने संकेत दिए हैं कि इन तीनों देशों को परमाणु ताक़त का दर्जा दिए बिना परमाणु अप्रसार संगठन में शामिल किया जा सकता है.

एवन्ज़ ने कहा, “निरस्त्रीकरण के लिए कई दूसरे तरीके और रास्ते हैं जिन पर चलकर भारत, पाकिस्तान और इसराइल इस दुनिया को ज़्यादा सुरक्षित बनाने में अपना असली योगदान दे सकते हैं.”

उनका मानना है कि भारत और अमरीका के बीच 2008 में हुआ असैन्य परमाणु समझौता एकतरफा और भारत के पक्ष में है. इस समझौते के तहत भारत अंतरराष्ट्रीय परमाणु तकनीक और ईंधन हासिल कर सकेगा.

भारत के लिए इस करार को ‘शानदार’ बताते हुए एवन्ज़ कहते हैं कि भारत को विदेश से परमाणु तकनीकी हासिल करने के साथ परमाणु बम बनाने के लिए विखंडन सामग्री तैयार करने की अनुमति भी दी गई है.

भारत-अमरीका परमाणु करार पर एवन्ज़ ने कहा, “भारत ने इसे बहुत आसानी से हासिल किया है और ये किसी और के लिए अच्छी मिसाल नहीं है.”

गैरेथ एवन्ज़ एक दिन की यात्रा पर पाकिस्तान जाएँगे. वो नहीं मानते कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को ठीक वैसा ही प्रस्ताव देगा जैसा कि भारत को मिला है. इसके अलावा परमाणु अप्रसार पर पाकिस्तान का रिकॉर्ड भी बहुत खराब है.

चीन का असर

एवन्ज़ मानते हैं कि दक्षिण एशिया को प्रभावी परमाणु मुक्त क्षेत्र के बनाने के विचार को परखें तो इसका सीधा संबंध चीन से है क्योंकि भारत चीन के साथ बराबरी की इच्छा रखता है.

वो कहते हैं, “दक्षिण एशिया और उत्तर एशिया के मामले में ये चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. ये भी सही है कि भारत और चीन के बीच की पहेली भी उतनी ही अहम है जितनी की कोई और.”

परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने का भारत का तर्क कहीं न कहीं उसकी प्रतिष्ठा और कद से जुड़ा हुआ है और साथ ही इस मंशा से भी कि वो चीन के समकक्ष वैकल्पिक शक्ति के रुप में उभरे.

नेतृत्व का सवाल

गैरेथ एवन्ज़ के मुताबिक निरस्त्रीकरण के मुद्दे पर आगे बढ़ना तभी संभव अगर अमरीका और रूस आगे बढ़कर अपने परमाणु हथियारों में कटौती करें और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि यानी सीटीबीटी प्रभावी तरीके से लागू हो.

उन्हें उम्मीद है कि भारत और चीन की तरह अमरीका भी यदि परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल न करने जैसा संकल्प दिखाता है तो दूसरे देश इसकी बहुत करीब से समीक्षा करेंगे.

अगर अमरीका ऐसा संकल्प दिखाता है तो अमरीका के साथ बेहद नज़दीकी संबंधों के चलते उत्तर अटलांटिक संधि संगठन यानी नेटो को भी इसी रास्ते में चलना होगा.

एवन्ज़ कहते हैं, “माहौल बदल रहा है. पिछले दस साल से इस मसले पर अमरीका अपने पैर घसीट रहा है और कछुआ चाल से चल रहा है. ये भी सही है कि परमाणु हथियार संपन्न देश इन्हें छोड़ने को राजी नहीं है.”

क्या वो वाकई मानते हैं कि परमाणु हथियार रखने वाले देश इन्हें छोड़ देंगे? गैरेथ एवन्ज़ का कहना है, “अगर हम वेरिफ़िक्शेन या सत्यापन के विज्ञान को सही-सही समझ पाएँ तो शायद हम सरकारों को समझा पाएँगे कि ये हथियार भी उन्हें जंग नहीं जितवा सकते.”

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