महिलाओं की मौत में वृद्धि

ग्रामीण महिलाएं
Image caption सुविधाओं के अभाव में प्रसव के दौरान मौतें होती हैं

अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच का कहना है कि भारत में तमाम सरकारी बंदोबस्त के बावजूद हज़ारों की तादाद में माताएं प्रसव के पहले और बाद में मर जाती हैं और सरकार के पास इसका कोई रिकार्ड भी नही है.

इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा अव्यवस्था की बात कही गई है, पर यहाँ कोई अधिकारी इस विषय पर चर्चा के लिए भी तैयार नहीं. डेढ़ सौ पेज की यह रिपोर्ट बुधवार को लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में जारी की गई.इस अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूप रेखा वर्मा एवं कई अन्य महिला सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थीं.

ह्यूमन राइट्स वाच ने अपने सर्वे पर आधारित एक वीडियो भी प्रर्दशित किया, जिसमें दिखाया गया है कि किस तरह गाँवों में गरीब महिलाएं उचित इलाज के अभाव में गर्भावस्था, प्रसव या उसके बाद दम तोड़ देती हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए भारत सरकार से मिलने वाली धनराशि का एक बड़ा हिस्सा बिना खर्च किए वापस कर देती है. पिछले वित्तीय वर्ष में ही सात सौ करोड़ रुपया वापस कर दिया गया.

ह्यूमन राइट्स वॉच की प्रवक्ता अरुणा कश्यप ने कहा, ''जब तक भारत प्रसव के दौरान मरने वाली सभी महिलाओं की वास्तविक संख्या की गिनती नहीं कर पाता तब तक इन हजारों अनावश्यक मौतों को रोकना संभव नही हो पाएगा.''

सवालों के जावाब में उन्होंने बताया कि उन्नाव, बाराबंकी,रायबरेली, चित्रकूट आदि अनेक जिलों में हुई ऎसी मौतों का सरकारी रिकार्ड्स में जिक्र तक नही है या फिर वास्तविकता से बहुत कम है.

अरुणा कश्यप ने मांग की कि जननी सुरक्षा कार्यक्रम ठीक से लागू करने के लिए हर जिले में उचित मॉनीटरिंग हो, शिकायत दर्ज कर उनका समाधान किया जाए और अस्पतालों में सामान तथा स्टाफ की व्यवस्था की जाए.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को पूरी जानकारी दे दी गई है, मगर कोई जवाब नहीं मिला.

रूप रेखा वर्मा ने इसे बहुत गंभीर और शर्मनाक बताया कि एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार हमेशा संसाधनों की कमी की बात कहती है, दूसरी ओर केंद्र से जो धन आता है उसे भी खर्च नही करती.

पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता शाहिरा नईम ने रिपोर्ट का स्वागत किया. उनका कहना है कि अखबारों में रोज ही इस तरह की खबरें छपती हैं कि महिला अस्पताल के गेट पर या सड़क पर तड़प कर मर गई.

मगर पहली बार एक मानवाधिकार संगठन ने सर्वे के आधार पर यह समस्या उजागर की है. इसलिए उम्मीद है कि सरकार अब कुछ कदम उठाएगी.

चित्रकूट से आई महिला स्वयमसेविकाओं ने बताया कि किस तरह वहां महिलाएं बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं. सरकारी डाक्टर अस्पताल के बजाय अपने नर्सिंग होम में काम करते हैं और सारा काम नर्स या ग्रामीण कार्यकर्ता आशा पर छोड़ देते हैं.

दरअसल ये सारे सवाल एक जवाबदेह और संवेदन शील प्रशासन से जुड़े हैं जो उत्तर प्रदेश की मूल समस्या मानी जाती है.

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