चीन की आपत्ति पर भारत का विरोध

अरुणाचल प्रदेश में विधान सभा चुनाव हुए हैं
Image caption भारत अरुणाचल को अपना अटूट अंग मानता है लेकिन चीन इसे विवादास्पद कहता है.

भारत ने चीन की इस आपत्ति पर विरोध प्रकट किया है कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह को इस 'विवादित सीमाक्षेत्र' का दौरा नहीं करना चाहिए था.

चीन की इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने मंगलवार को कहा, "अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अटूट हिस्सा है. अरूणाचल प्रदेश में रहने वाले लोग भारत के नागरिक हैं और वे भारतीय लोकतंत्र की मुख्य धारा में शामिल रहने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं. चीन सरकार भी भारत के इस स्पष्ट रुख़ से भली-भाँति परिचित है."

चीन ने भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर यह कहते हुए 'ज़ोरदार आपत्ति' जताई है कि वो एक ऐसा सीमावर्ती क्षेत्र है जिस पर विवाद चल रहा है.

चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता मा झाओक्सू ने सरकारी ने समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने एक वक्तव्य जारी करके कहा है, "भारतीय नेता ने विवादित सीमावर्ती क्षेत्र का दौरा करके एक बार फिर चीन की गंभीर चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया है और इस यात्रा पर चीन प्रबल रूप से असंतुष्ट है."

प्रवक्ता ने कहा कि चीन और भारत ने अपनी सीमा रेखा का कभी भी आधिकारिक रूप से रेखांकन नहीं किया है और चीन-भारत सीमा के पूर्वी हिस्से पर चीन का रुख़ बिल्कुल स्पष्ट है.

प्रवक्ता मा झाओक्सू का कहना था, "हम माँग करते हैं कि भारत सरकार चीन की गंभीर चिंताओं पर ध्यान दे और विवादित क्षेत्र में अशांति को ना भड़काए ताकि चीन और भारत संबंधों के सदभाव के साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सके. "

भारतीय मीडिया संगठनों में छपी ख़बरों में कहा गया है कि प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने मंगलवार को अरूणाचल प्रदेश का दौरा किया और वहाँ एक चुनाव रैली को संबोधित किया.

भारतीय प्रवक्ता ने अपने बयान में यह भी कहा कि "भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक प्रचलित परंपरा है कि जब संसद या राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव होते हैं तो राजनीतिक नेता उन क्षेत्रों का दौरा करते हैं. भारत सरकार देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले अपने नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए कटिबद्ध है."

आपसी समझ रखें पत्रकारों के एक प्रश्न के उत्तर में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "भारत और चीन के बीच यह सहमति है कि सीमा से संबंधित जो भी मुद्दे हैं उन पर दोनों सरकारों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत होगी. इसलिए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने वक्तव्य जारी करके जो चिंता व्यक्त की है, उस पर भारत सरकार को निराशा हुई है क्योंकि दोनों देशों के बीच सीमा के मुद्दों पर जो बातचीत चल रही है, इस तरह के वक्तव्यों से उसमें कोई मदद नहीं मिलेगी."

प्रवक्ता ने कहा कि भारत चीन सरकार के साथ मतभेदों को निष्पक्ष, तार्किक और इस तरीक़े से हल करना चाहता है जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो लेकन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये मतभेद दोनों देशों के सदभावपूर्ण संबंधों पर कोई नकारात्मक असर ना डालें.

प्रवक्ता ने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि चीन सरकार भी इसी आपसी समझ के आधार पर काम करेगी."

इस पर चीन में एक भारतीय पत्रकार सैबल दास गुप्ता कहते हैं कि कुछ ऐसे विषय है जिस पर चीन सरकार हमेशा नाराज़गी जताती है. अगर नहीं जताती है तो उनकी विदेश नीति को ठेस पहुंचती है मसलन दलाई लामा दुनिया के किसी भी देश में जाए उसका विरोध करेंगें, ताईवान में कोई भी जाए वो इसका विरोध करेंगे क्योंकि वो ताईवान को अपने देश का हिस्सा मानते है.

सैबल दास गुप्ता का कहना था, "अरुणाचल का मुद्दा दूसरा है. भारत के प्रधानमंत्री अपने ही देश में जा रहे है, सवाल ये है कि चीन को क्या आपत्ति है लेकिन अगर वो अपना गुस्सा ज़ाहिर नहीं करेंगे तो उसका अर्थ ये होगा उन्होंने अरूणाचल को भारत का हिस्सा मान लिया है. दुनिया के सामने ये तो वो स्वीकार करना चाहते नही हैं क्योकि सीमा विवाद चल रहा है.इसकी चर्चा चल रही है. ये एक प्रकार की औपचारिकता है."

सैबल दास गुप्ता कहते हैं कि इस पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नही है. अगर भारत के प्रधानमंत्री तवांग के मोनास्ट्री में जाए तब चीन की प्रतिक्रिया क्या होगी ये असल देखने वाली बात होगी. लेकिन भारत भी सीमा पार नहीं करेगा.