अमीरकी मुसलमानों में डर

विरोध प्रदर्शन
Image caption मुसलमानों का कहना है कि उनके साथ नस्लभेद हो रहा है.

अमरीका में रहने वाले बहुत से मुसलमानों का कहना है कि क़ानून लागू करने वाली संस्थाएं जैसे फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इनवेस्टिगेशन (एफ़बीआई) और पुलिस विभाग कई शहरों में मुसलमानों को उनके धर्म के आधार पर निशाना बना रही हैं.

इन लोगों का कहना है कि मुसलमानों पर हर समय नज़र रखी जा रही है और बहुत से मुसलमानों की रोज़मर्रा की गतिविधियों के साथ- साथ उनके घर औऱ मस्जिदों पर भी नज़र रखी जा रही है.

कथित चरमपंथियों को पकड़ने के लिए मुस्लिम समुदाय के कई घरों पर एफ़बीआई और पुलिस की छापेमारी के बाद इस धारणा को बल मिला है.

न्यूयॉर्क में क्वींस के इलाके में इसी सिलसिले में मुसलमानों और मानवाधिकार संस्थाओं ने मिलकर विरोध प्रदर्शन भी किया.

अमरीका में रहने वाले मुसलमान ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद से ही कानूनी संस्थाओं के शक के दायरे में रहे हैं.

लेकिन हाल ही में क्वींस के इलाके में ही एफ़बीआई और पुलिस के साथ करीब 20 अन्य आतंकवाद विरोधी दस्तों ने मिलकर कई घरों पर छापे मारे थे. उनको शक था कि इन घरों में रहने वाले लोगों का नाता आतंकवादियों से है जो न्यूयॉर्क पर हमला करने की योजना बना रहे हैं.

गिरफ़्तारी

जिन घरों पर छापे मारे गए थे वह सभी मुसलमानों के थे और उनमें से ज़्यादातर अफ़ग़ानी मूल के लोग थे जो अमरीका आने से पहले कई साल पाकिस्तान में रहे थे.

इसी सिलसिले में कोलोरैडो शहर में भी कुछ घरों पर छापे मारे गए औऱ इनमें से एक व्यक्ति नजीबुल्लाह ज़ाज़ी को अल कायदा का सदस्य होने के शक में गिरफ़्तार भी कर लिया गया है.

उस पर यह भी इल्ज़ाम है कि वह पाकिस्तान में बम बनाने की ट्रेनिंग लेकर न्यूयॉर्क में भूमिगत रेल और अन्य भीड़-भाड़ वाले इलाकों में बम धमाके करने की तैयारी कर रहा था.

इस सिलसिले में न्यूयॉर्क में क्वींस के इलाके में कई लोगों को एफ़बीआई और पुलिस ने घरों से उठाकर पूछताछ करके छोड़ तो दिया है लेकिन उनपर बराबर नज़र रखी जा रही है.

और यह सभी लोग इलाके की जिस मस्जिद अबू बकर में नमाज़ पढ़ने जाते थे उसके इमाम अहमद अफ़ज़ाली को भी एफ़बीआई ने इसी सिलसिले में गिरफ़्तार किया था लेकिन उसे ज़मानत पर छोड़ दिया गया है. उसपर एफ़बीआई और पुलिस से झूठ बोलने का आरोप लगाया गया है.

इन छापों के बाद से ही न्यूयॉर्क के मुसलमानों में ख़ौफ़ व्याप्त है.

विरोध प्रदर्शन के दौरान मुसलमानों ने अपनी इसी परेशानी के बारे में आवाज़ उठाई और सरकार से न्याय की मांग की है.

इस प्रदर्शन का आयोजन करने वाली न्यूयॉर्क स्थित अप्रवासियों की संस्था 'देसीज़ राइज़िंग अप एंड मूविंग' या ड्रम की संस्थापक मोनामी मलिक कहती हैं कि सरकार को चाहिए कि कानून के भीतर रह कर सुरक्षा सुनिश्चित करे.

'नस्ली भेदभाव'

Image caption इस मस्जिद के इमाम को गिरफ़्तार किया गया था.

मोनामी मलिक कहती हैं, “हम मुस्लिम हैं, हम दक्षिण एशियाई हैं, हमारा रंग गोरा नहीं है इसलिए हमारे साथ नस्ली भेदभाव हो रहा है. और यह हमारे इस देश के क़ानून के तहत नहीं हो रहा है. जो भी दिखने में मुसलमान है उसके घर और मस्जिद पर छापे मारे जा रहे हैं और उनसे पूछताछ की जा रही है. और इससे मुसलमानों में यह डर बैठ गया है कि जो भी मुसलमान की तरह दिखता है वह सभी आतंकवादी हैं. हम चाहते हैं कि पुलिस और अन्य संस्थाएं अपना तरीका बदलें.”

इसी प्रदर्शन में शाहीना परवीन भी शामिल थीं जिनके बेटे को चंद साल पहले न्यूयॉर्क के भूमिगत रेल स्टेशन को बम से उड़ाने की साज़िश रचने के लिए तीस साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई है.

वह कहती हैं, “हमारी मस्जिदों में खबरी भेजकर हमारे बच्चों और मर्दों को फुसला कर फंसाया जाता है. यहां कोई आतंकवादी नहीं हैं, कोई मुजरिम नहीं है. सुरक्षा के लिए मुजरिम पकड़ें लेकिन बिना किसी बुनियाद के किसी को मुजरिम करार न दें.”

लेकिन एफ़बीआई और पुलिस इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहते हैं कि वे सिर्फ़ कानून का उल्लंघन करने वालों और सुरक्षा को ख़तरा पहुंचाने वालों के ख़िलाफ़ ही कार्रवाई करते हैं.

इन विरोध प्रदर्शनों के बाद एफ़बीआई ने एक बयान जारी कर इस बात का खंडन किया कि मुसलमानों को किसी नस्ली भेदभाव का शिकार बनाया जा रहा है.

पुलिस का इनकार

एफ़बीआई के बयान में कहा गया,“ एफ़बीआई किसी प्रकार का नस्ली भेदभाव नहीं करती है. हम सोच समझकर ऐसे व्यक्तियों या गिरोहों के खिलाफ़ अपनी जांच करते हैं जिन्होंने या तो क़ानून का उल्लंघन किया हो या वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा हों.”

Image caption सुल्तान फ़ैज का कहना है कि मुसलमान अब मस्जिद में आने से भी डर रहे हैं.

लेकिन इससे मुसलमानों का डर कम नहीं हुआ है.

न्यूयॉर्क में बंग्लादेशी मूल की सामाजिक कार्यकर्ता आयशा मेहमूदा कहती हैं, “बहुत सी औरतें बताती हैं कि जब उनके मर्द काम पर चले जाते हैं तो जो पुलिस वाले उनके घर के बाहर रहते हैं. वह उनसे उनका नाम पूछते हैं, उनसे पहचान पत्र मांगते हैं, उनके बारे में पूछते हैं, पूछते हैं वह कहां जा रही हैं. इसलिए सब बहुत डरे हुए हैं. और यह उनके साथ नाइंसाफ़ी हो रही है.”

सुल्तान फ़ैज़ अफ़ग़ानी मूल के हैं, जो कुछ अर्सा पाकिस्तान में भी रहे हैं. अब वह कई सालों से अमरीका में रह रहे हैं. फ़ैज़ भी उसी मस्जिद अबू बक्र में नमाज़ पढ़ने जाते हैं जिसके इमाम को एफ़बीआई ने गिरफ़्तार किया था.

उनका कहना है, “लोग यह समझते हैं कि अगर मस्जिद में जाएंगे तो उनसे भी पूछताछ होगी और पुलिस उन पर भी शक करेगी. उनके घरों में छापे भी मारे जा सकते हैं. इसी डर से लोग अब मस्जिद से भी दूर रहने लगे हैं.”

लेकिन इस सबके बीच पुलिस और एफ़बीआई अब भी अपना काम कर रही है और आतंकवादी गतिविधियों के सिलसिले में कुछ लोगों पर अब भी नज़र रखी जा रही है.

सुरक्षा संस्थाओं का मानना है कि ये लोग भी न्यूयॉर्क में नए हमले करने की साजिशों में शामिल हैं.

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