पश्चिम बंगाल में नक्सली राजनीति तेज़

लालगढ़
Image caption लालगढ़ में माओवादियों के खिलाफ अभियान

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वो आगामी चुनाव में सीपीएम के पक्ष में मतदान करें क्योंकि ममता बनर्जी माओवादियों के साथ मिलकर राज्य में अस्थिरता पैदा करना चाहती हैं.

ज्योति बसु पार्टी के वरिष्ठतम नेता हैं और उनका कोई भी बयान पार्टी का आधिकारिक बयान समझा जाता है.

यानी समझा जा सकता है कि साल 2011 में होने वाले विधान सभा चुनाव में पार्टी का साम्राज्य डिगने की आहट पार्टी नेताओं को सुनाई दे रही है.

लेकिन ये भय सिर्फ सीपीएम को ही नहीं है.

हाल ही में राज्य में सीपीएम के मज़बूत विकल्प के तौर पर उभरी तृणमूल कांग्रेस में भी उतना आत्म विश्वास नहीं है जितना कि लोकसभा चुनाव में उनकी जीत के बाद अनुमान लगाए जा रहे थे.

Image caption बुद्धदेव भट्टाचार्य ममता बनर्जी पर आरोप लगा रहे हैं माओवादियों का साथ देने का

इसका नतीजा दोनों ही पार्टियों के बीच माओवादियों से सांठ- गांठ के आरोप- प्रत्यारोप के रूप में सामने आया है.

सीपीएम के नेता तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को माओवादियों का सहयोगी कह रहे हैं तो ममता बनर्जी सीधे- सीधे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को माओवादी कह रही हैं.

साथ ही दोनों ही दल कांग्रेस पार्टी को राज्य में अपने खेमे में लाने की कोशिश में जुटे हैं.

ताक़तवर माओवादी

लेकिन सवाल उठता है कि माओवाद इस क़दर राज्य के शासन तंत्र को अगर परेशान किए हुए है तो क्यों. आखिर किसान, आदिवासी, ग़रीब, मज़दूर या साम्यवाद की भाषा में कहें तो सर्वहारा वर्ग की लड़ाई लड़कर सत्ता में आने वाले वामपंथी आज लगभग अपनी ही विचारधारा के कुछ लोगों के दुश्मन क्यों बने हैं.

बीबीसी के पूर्वोत्तर संवाददाता सुबीर भौमिक कहते हैं कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या वामपंथी पार्टियों की, नेता एक ही वर्ग के थे. यानी अभिजात्य वर्ग के. उन्हें किसानों और आदिवासियों की मूल समस्याओं की जानकारी ही नहीं है तो उनका निदान क्या करेंगे.

अगर माओवादियों की बात की जाए तो इनका सबसे ज़्यादा प्रभाव मध्य बंगाल के इलाक़े में है जहां लालगढ़ भी पड़ता है. विकास के नाम पर ये बेहद पिछड़ा इलाक़ा है और विकास के जो काम हुए भी हैं उसका फ़ायदा यहां के स्थानीय निवासियों को नहीं मिला है.

सुबीर भौमिक कहते हैं, ‘विकास तो कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि यहां के लोगों की समस्याओं को तो नेता कभी समझे ही नहीं. सीपीएम के भूमि सुधार का भी इन लोगों को लाभ नहीं मिला. आदिवासियों को उम्मीद थी कि अलग झारखंड राज्य बनने पर उन्हें कुछ फ़ायदा मिलेगा, लेकिन इस इलाक़े को झारखंड राज्य में शामिल नहीं किया गया और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इस इलाक़े को शामिल किए बिना ही अलग राज्य को स्वीकार कर लिया.’

सीपीएम नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए सुबीर भौमिक कहते हैं, ‘नेतृत्व तो आजकल बंगाली भद्र लोक के हाथ में है. आज नेतृत्व उन लोगों के हाथ में है जो सीधे छात्र राजनीति से निकल कर पार्टी में शामिल हो जाते हैं. किसानों और आदिवासियों के बीच से नेता आ ही नहीं रहे हैं तो इनकी मूल समस्या कैसे समझी जाएगी. पुराने नेता ज़रूर समझते थे क्योंकि वो किसान सभा, ट्रेड यूनियन जैसे संगठनों से आते थे और इनकी समस्याओं को बखूबी समझते थे.’

जानकारों का कहना है कि अपने पच्चीस साल के शासन काल में सीपीएम ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे कि आदिवासियों को सीधे तौर पर कोई फ़ायदा हुआ हो. आधारभूत विकास संबंधी जो काम हुए भी यानी सड़कें इत्यादि के निर्माण से केवल बड़े व्यापारियों और ठेकेदारों को लाभ हुआ, स्थानीय आदिवासियों को नहीं.

और अब जबकि माओवादियों को असामाजिक तत्व घोषित कर एक- दूसरे पर उनसे जुड़ने के आरोप लगाए जा रहे हैं तो उसके निहितार्थ भी राजनीति से ही जुडे़ हैं.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि साल 2011 के विधान सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस दोनों ही नए राजनीतिक समीकरण तलाश रहे हैं. पश्चिम बंगाल सरकार भी माओवादियों को सबक सिखाने और समूल उखाड़ फेंकने की बात तो कर रही है लेकिन आज भी माओवाद और माओवादियों की असल समस्याओं की ओर ध्यान नहीं है.

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