एवरेस्ट पर मंत्रिमंडल की बैठक

हिमालय के ग्लेशियर
Image caption पृथ्वी के तापमान के बढ़ने से हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं.

पृथ्वी के बढ़ते तापमान से हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के ख़तरे को उजागर करने के लिए नेपाल की सरकार, एवरेस्ट शिखर के बेस कैम्प पर मंत्रिमंडल की बैठक करने की योजना बना रही है.

नेपाल के वन मंत्री दीपक बोहारा ने बताया कि दिसंबर में कोपनहेगन में होने वाले जलवायु सम्मेलन से पहले समूचा मंत्रिमंडल एवरेस्ट के बेस कैम्प पहुंचेगा जो 17 हज़ार फ़िट की ऊंचाई पर है. यहीं से पर्वतारोही शिखर की चढ़ाई शुरु करते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय के ग्लेशियर बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं जिसके कारण उससे निकलने वाली नदियों का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा.

पिछले महीने हिंद महासागर के देश मालदीव ने भी इसी तरह समुद्र के भीतर मंत्रिमंडल की बैठक की थी. समुद्रों के जल स्तर के बढ़ने से मालदीव के द्वीपों के जलमग्न हो जाने का ख़तरा है.

'हिमालय पिघल रहा है'

नेपाल के वन मंत्री दीपक बोहारा ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, '' हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि हिमालय पिघल रहा है लेकिन इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा. बेस कैम्प पर जो बैठक होगी वह पर्यावरण परिवर्तन पर केंद्रित होगी जिससे दुनिया का ध्यान आकर्षित किया जा सके. पर्यावरण के संरक्षण के लिए और क्या कुछ किया जा सकता है हम उस दिशा में भी काम करेंगे.''

बोहारा ने कहा कि नेपाल अपने कुछ जाने माने एवरेस्ट पर्वतारोहियों को अगले महीने कोपनहेगन भेजेगा जिससे ग्लेशियरों के पिघलने, अनिश्चित वर्षा चक्र और जंगलों की आग जैसी समस्याओं को उजागर किया जा सके.

दिसंबर में डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में होने वाले जलवायु सम्मेलन में पर्यावरण के एक नए विश्व समझौते पर बातचीत होनी है.

विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में दुनिया के 14 सबसे ऊंचे पर्वत शिखर हैं.

नेपाल दुनिया के कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के केवल .025 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार है लेकिन उसे इन शिखरों की बर्फ़ पिघलने का भारी ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा.

हिमालय के हज़ारों ग्लेशियर एशिया की दस प्रमुख नदियों का स्रोत हैं जिनपर करोड़ों का जीवन निर्भर है. पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण अगले पचास वर्षों में ये नदियाँ सूख सकती हैं.

पिछले सौ वर्षों में दुनिया औसत तापमान .74 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है लेकिन काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर माउंटेन डिवेलपमेंट का कहना है कि इसका असर हिमालय पर सबसे अधिक हुआ है.

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