उत्तर प्रदेश में चीनी का आयात रुका

गन्ने के खेत
Image caption गन्ना किसानों के विरोध के बाद उत्तर प्रदेश में कच्ची चीनी का आयात रुका.

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के आंदोलन को देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों के ब्राज़ील से खाड़सारी (कच्ची चीनी) के आयात करने पर रोक लगा दी है.

लेकिन किसान इतने मात्र से संतुष्ट नही हैं. वो गन्ने का अधिक मूल्य दिलाए जाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं.

केबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने प्रेस को बताया, " बजाज ग्रुप की एक निजी चीनी मिल ने कच्ची चीनी का आयात किया था लेकिन राज्य सरकार की रोक के बाद यह खेप कांधला पोर्ट पर ही रोक दी गई है."

भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के आह्वान पर हाल में मुज़फ़्फ़रनगर के शामली क़स्बे में किसानों ने आयातित चीनी मालगाड़ी से उतार कर जला दी थी.

गन्ने के मूल्य पर विवाद

कैबिनेट सचिव ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार चीनी मिलों से राज्य सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य का भुगतान कराएगी.

राज्य सरकार ने औसत गन्ने का मूल्य 165 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है. जबकि केंद्र सरकार ने 130 रुपये प्रति क्विंटल को उचित मूल्य घोषित किया है जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने अनुचित बताया है.

कैबिनेट सचिव के अनुसार इस साल उत्तर प्रदेश में गन्ना उत्पादन में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आई है. इसे देखते हुए चीनी मिलों ने कच्ची चीनी के आयात का निर्णय किया जिससे उसे साफ़ करके बेजा जा सके.

मिल मालिक कह रहे हैं कि आयात पर प्रतिबन्ध अस्थाई है और किसान आन्दोलन शांत होते ही कच्ची चीनी बंदरगाह से लाने दी जाएगी.

भारतीय किसान यूनियन का कहना है कि इस साल चीनी के दाम जितने बढे़ हैं उसकी तुलना में गन्ने का दाम बहुत कम है जबकि लागत बहुत ज़्यादा है. विरोध स्वरूप किसानों ने कई जगह खेतों में गन्ना जलाया है.

किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत ने अपनी प्रतिक्रया में कहा है, " कोई किसान इस दाम पर गन्ना नहीं देगा. जब मिलें स्वयं 200 रुपए प्रति क्विंटल दाम देने को तैयार हैं तो फिर केंद्र और राज्य सरकार क्यों अड़ंगा डाल रही हैं.''

राकेश टिकैत ने मुख्यमंत्री मायावती को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया कि उन्होंने ढाई साल के कार्यकाल में एक बार भी किसानों के प्रतिनिधि मंडल को मिलने का समय नहीं दिया.

लोक दल नेता चौधरी अजित सिंह ने बृहस्पतिवार पांच नवम्बर को मेरठ में किसान पंचायत बुलाई है. विरोधी दल इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं.

सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी को डर है कि सात नवम्बर को होने वाले विधान सभा और लोक सभा उप चुनावों में इसका प्रतिकूल असर न पड़े.

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