फ़तवे के विरोध में आए रामदेव

बाबा रामदेव
Image caption जमीयत द्वारा वंदे मातरम् पर फ़तवे के ख़िलाफ़ हैं रामदेव

जमीयत उलेमा हिंद के वंदे मातरम् पर फतवे के विरोध में अब स्वामी रामदेव और गुरू रविशंकर भी आगे आ गए हैं.

देवबंद में जमीयत उलेमा हिंद के राष्ट्रीय अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके मुसलमानों से वंदे मातरम् न गाने के लिये कहा गया था क्योंकि कथित तौर पर ये इस्लाम के ख़िलाफ़ है.

देवबंद में जमीयत उलेमा हिंद के जिस अधिवेशन में वंदे मातरम् पर विवादास्पद प्रस्ताव पारित किया गया उसमें केद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम् और योग गुरू बाबा रामदेव ने भी हिस्सा लिया था.

केंद्रीय गृहमंत्री की मौजूदगी और इस प्रस्ताव पर जब भारतीय जनता पार्टी ने बावेला मचाया तो ये सफाई दी गई कि चिदंबरम् अधिवेशन में ज़रूर थे लेकिन उस वक्त नहीं जब वंदे मातरम् पर फतवा जारी किया गया.

साथ में ये भी दलील दी गई कि इस प्रस्ताव के बारे में उन्हें पहले से जानकारी नहीं थी और वैसे भी वो मंच पर लिखा हुआ भाषण पढ़ रहे थे.

कॉंग्रेस ने ये कहकर भी रक्षात्मक मुद्रा अख्तियार कर ली कि ये बेहद संवेदनशील मुद्दा है लेकिन ये मुद्दा बाबा रामदेव के लिए गले की हड्डी बन गया.

हरिद्वार के प्रमुख धर्मगुरूओं और अखाड़ा परिषद ने उन्हें आड़े हाथों लिया और कहा कि सार्वजनिक माफी मांगकर वो अपनी निष्ठा का परिचय दें वरना बहिष्कार के लिए तैयार रहें.

हवा का रूख देखकर रामदेव को फतवे के विरोध में आगे आना पड़ा.उन्होंने कहा, "ये अनुचित प्रस्ताव है क्योंकि वंदे मातरम् का मतलब किसी पूजा पद्धति से नहीं बल्कि देशभक्ति की भावना से है. अगर कोई इसके ख़िलाफ़ है तो ये भ्रम के कारण है."

उधर एक कार्यक्रम में शिरकत करने देहरादून आए आध्यात्मिक गुरू रविशंकर ने भी इस फतवे का विरोध करते हुए इसे जानबूझकर अप्रिय स्थिति पैदा करने की कोशिश करार दिया.

गुरू रविशंकर ने कहा, "आख़िर आज़ादी के 62 साल बाद भी क्यों इस मुद्दे को उठाया जा रहा है. इसकी कोशिश वे लोग कर रहे हैं जो हिंदू-मुसलमानों को एक साथ नहीं रहने देना चाहते हैं और उनमें दरार पैदा करने की कोशिश करते हैं. मैं इस बारे में उलेमाओं से बात करने देवबंद जाऊंगा."

उनका भी ये कहना था कि वंदे मातरम् का अर्थ सिर्फ पूजा नहीं बल्कि इसका अर्थ सद्भावना प्रकट करना भी है.

देवबंद की इस बैठक में 'टीवी,सिनेमा, औरतों के आरक्षण पर भी कुछ विवादास्पद प्रस्ताव जारी किये गये जिनपर आम चर्चा हो सकती थी.

लेकिन फ़िलहाल वंदे मातरम् के मुद्दे और उस पर उठे विवाद ने सामाजिक और राजनीतिक ताकतों को गोलबंद होने का मौका ज़रूर दे दिया है.

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