चिनावाट के प्रत्यर्पण की मांग ख़ारिज

  • 11 नवंबर 2009
कंबोडिया के प्रधानमंत्री के साथ थाकसिन चिनावाट
Image caption थाकसिन चिनावाट को कंबोडिया के प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार की नौकरी मिली है.

कंबोडिया ने थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन चिनावाट के प्रत्यर्पण की थाईलैंड की मांग को ख़ारिज कर दिया है.

बुधवार की सुबह थाईलैंड ने कंबोडिया से थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन चिनावाट के प्रत्यर्पण की मांग की थी.

थाईलैंड के तीन राजनयिकों ने कंबोडिया के विदेश मंत्रालय में अधिकारियों को प्रत्यर्पण संबंधी दस्तावेज़ सौंपे और यह मांग रखी थी.

कंबोडिया ने पूर्व में भी साफ़ किया था कि कि वो ऐसी किसी भी मांग को ख़ारिज कर देगा.

थाकसिन को 2006 में तख्तापलट के बाद भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में थाईलैंड में सज़ा दी गई थी. इसके बाद थाकसिन देश छोड़कर दुबई चले गए थे. वो मंगलवार से अब वो कंबोडिया में हैं जहां उन्हें प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार का काम दिया गया है.

बीबीसी की दक्षिण पूर्व एशिया संवाददाता रैचेल हार्वी का कहना है कि प्रत्यर्पण की मांग की उम्मीद थी और इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका है.

हार्वी के अनुसार थाकसिन का पड़ोसी देश में ही रहना वर्तमान थाईलैंड सरकार के लिए परेशानी का कारण है.

कंबोडिया का कहना है कि थाकसिन के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं.

कंबोडिया के विदेश मंत्री हो नामहोंग का कहना था, ''सितंबर 2006 में जब थाकसिन प्रधानमंत्री थे उसी दौरान तख्तापलट हुआ. और उसके बाद उनके ख़िलाफ़ आरोप लगाए गए. थाकसिन लोगों के वोटों से जीतकर प्रधानमंत्री बने थे. वो लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए थे.''

थाईलैंड के प्रधानमंत्री अभिसीत वेज्जाजीवा का कहना है कि अगर थाकसिन को थाईलैंड को नहीं सौंपा गया तो कंबोडिया के साथ प्रत्यर्पण संधि रद्द करने पर विचार किया जाएगा.

थाकसिन के मामले पर कंबोडिया और थाईलैंड के बीच विवाद गहराता जा रहा है. थाईलैंड ने पहले ही कंबोडिया से अपना राजदूत वापस बुला लिया है. इसके बाद थाईलैंड की कैबिनेट ने कंबोडिया के साथ व्यापार और तेल भंडारों की संयुक्त रुप से खोजने की योजनाओं को रद्द कर दिया है.

माना जाता है कि थाईलैंड की सरकार इस बात से चिंतित है कि थाकसिन बिल्कुल पड़ोस में रहकर थाईलैंड में अपनी खोई ज़मीन फिर तैयार कर सकते हैं.

थाईलैंड में 2006 में थाकसिन चिनावाट की सरकार का तख्तापलट कर दिया गया था जिसके बाद कुछ समय तक सैनिक शासन रहा जिसके बाद अभिसीत वेज्जाजीवा प्रधानमंत्री बने थे.

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