बदलते मौसम की मार महिलाओं पर

  • 18 नवंबर 2009
Image caption संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पर्यावरण परिवर्तन से सबसे अधिक महिलाएं प्रभावित होती हैं.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने चेतावनी दी है कि पर्यावरण परिवर्तन का विकासशील देशों की महिलाओं पर सबसे अधिक असर पड़ेगा.

कोष का कहना है कि महिलाओं पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ है. खेती से जुड़े अधिकतर काम वो करती हैं इसलिए प्राकृतिक विपदाओं का प्रभाव भी उनपर अधिक पड़ता है.

कोष की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि परिवार नियोजन को बेहतर बनाने और महिलाओं की भूमिका बदलने से पर्यावरण परिवर्तन का भावी मार्ग प्रभावित हो सकता है.

रिपोर्ट में पहली बार जनसंख्या वृद्धि का विषय उठाया गया है. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की इस रिपोर्ट का कहना है कि पृथ्वी पर बढ़ती आबादी को रोकना पर्यावरण परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

बढ़ती आबादी

इस समय पृथ्वी की जनसंख्या कोई 7 अरब है और इस शताब्दी के मध्य तक ये 9 अरब पहुंच जाएगी. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट कहती है कि अगर ये वृद्धि दर घट जाए तो भविष्य में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी आ सकती है.

अनुमान है कि सन 2100 तक पृथ्वी का तापमान 4 से 6 डिग्री सैल्सियस बढ़ जाएगा जिसका पर्यावरण, प्राकृतिक वास, अर्थव्यवस्था और आबादी पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है.

तापमान बढ़ने से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ़ तेज़ी से पिघलेगी, समद्र का जल स्तर बढ़ेगा जिससे बहुत से इलाक़े जलमग्न हो जाएंगे. सूखे के कारण लोग बसे बसाए के इलाक़ो को छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे और ग़रीब लोग अपने जीवन यापन के साधनों से वंचित हो जाएंगे.

महिलाओं पर असर

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पर्यावरण परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होती हैं महिलाएं. प्राकृतिक विपदाओं में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के मरने की संभावना अधिक रहती है.

बहुत से देशों में खेतिहर मज़दूरी महिलाएँ अधिक करती हैं. जब सूखा पड़ता है तो महिलाओं को भोजन पानी जुटाने के लिए और अधिक श्रम करना पड़ता है.

परिवार नियोजन और आर्थिक विकास के संदर्भ में उनकी भूमिका सुधारना पृथ्वी के तापमान में हो रही वृद्धि के ख़िलाफ़ एक महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की कार्यकारी निदेशक थोराया अहमद ओबैद कहती हैं, "परिवार का आकार, कब और कितने बच्चे हों इसका विकल्प पहला अधिकार है. दूसरा है उन्हे फ़ैसले करने की प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना".

आबादी का विस्थापन

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट में बदलते पर्यावरण के प्रवास पर हो रहे असर पर भी चिंता व्यक्त की गई है.

थोराया उबैद कहती है, "जब हम लोगों की बात करते हैं तो हमें बाढ़, सूखे या तटीय नगरों के समुद्र में डूब जाने के कारण लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने की संभावना पर भी ध्यान देना चाहिए. हम चाहेंगे कि यह काम तरतीब से हो न कि अव्यवस्थित ढंग से".

इस रिपोर्ट के लेखकों का तर्क है कि अगले महीने कोपनहेगन में होने वाले पर्यावरण सम्मेलन में जो भी समझौता होता है उसमें आबादी और लिंग के विषयों को भी ध्यान में रखना होगा तभी वह दीर्घकाल में सफल हो सकेगा.

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस पृथ्वी की जलवायु को मानव जाति के रहने योग्य बनाए रखने के लिए दशकों क्या शताब्दियां लग सकती हैं.

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