लिबरहान लीक से फायदा किसका?

बाबरी मस्जिद
Image caption आडवाणी ने लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश करन की मांग की है

संसद का सत्र जारी है और सरकार गन्ना किसानों की आवाज़ से जूझ ही रही थी कि लिबरहान कमीशन की रिपोर्ट चर्चा का विषय बन गई.

किसने लीक की लिबरहान रिपोर्ट, अभी क्यों और इसका राजनीतिक नफ़ा नुक़सान क्या है, सभी के मन में ये सवाल गूंज रहा है.

लिबरहान साहब पिछले देड़ दशक से ये जानने की कोशिश में लगे है कि बाबरी मस्जिद को तोड़ने के पीछे क्या कारण थे.

अब एक अखबार में लीक रिपोर्ट को माने तो विध्वंस सोची समझी योजनाबद्ध कार्रवाई थी.

इसमें संघ परिवार का हाथ था. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्हें अब तक भाजपा का नर्म चेहरा बताया जाता रहा वो इस साजिश में शामिल थे.

रिपोर्ट तत्कालीन नरसिंहा राव सरकार को भी लगभग दोषमुक्त करती है, कहती है केंद्र की कांग्रेस सरकार क्या कर सकती थी, वो तब तक क्या कर सकती थी जब तक राज्य सरकार उन्हें नहीं बुलाती और उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को शायद बहुत देर तक ऐसी मदद की ज़रुरत महसूस नहीं हुई.

रिपोर्ट ने मुस्लिम नेतृत्व को भी नहीं बख्शा. और सवाल राज्यपाल की लंबी चुप्पी पर भी है.

अभी क्यों

पर ध्यान दीजिए, बिखरे हुए विपक्ष ने गन्ना किसानों के मामले में गज़ब का समन्वय दिखाया, अजित सिंह, मुलायम सिंह, भाजपा और वामपंथी दल एक स्वर में बोले.

मधु कोड़ा के कथित भ्रष्टाचार का मामला झारखंड चुनावों के बीच छाया है, साथ ही स्पेक्ट्रम घोटाला भी केंद्र का सिरदर्द बना है.

तो क्या इस सबसे ध्यान हटाने के लिए लिब्रहान का जिन्न एक बार फिर आया है जैसे कई चुनावों के पहले भी रह रह कर आया करता था.

ये रिपोर्ट जून में जस्टिस लिबरहान ने सरकार को सौंपी थी. फिर सरकार ने ये रिपोर्ट पिछले सत्र में क्यों पेश नहीं की, इस सत्र के शुरु होते ही इसे क्यों नहीं पेश किया गया. अब क्या सही समय था... मन में बेशक ये सवाल उठता है.

क्या शीर्ष भाजपा नेतृत्व की इस कांड में मिलीभगत की बात कह कर, बैकफुट पर गए भाजपा नेताओं में नई स्फूर्ति भर दी गई है? वाजपेयी के नाम के आते ही आडवाणी को भी मौका़ दिया गया कि वो अपने पूज्य नेता के बचाव में आकर पार्टी में अपने क्षीण पड़े कंद को वापिस पा जाएँ.

वहीं कल्याण सिंह के तजुर्बे के उतने सफल न होने के बाद फिर मुसलमानों का साथ मांगते मुलायम सिंह को भी आशा है कि वो बाबरी के सहारे ही सही उत्तरप्रदेश की राजनीति में वापसी की आस बना लें.

मामले का महत्व

तो कुल मिलाकर जो सबने अपनी आंखों से देखा था, वो जो स्वतंत्र भारत के राजनीतिक घटनाचक्र में धर्म को भुनाने की कोशिश थी, आस्था के नाम पर क़ानून अपने हाथ में लेने का दुस्साहस था उसे अब भारी भरकम रिपोर्ट के साथ लिबरहान ने पेश किया और आलोचक कह सकते है कि वो भी राजनीति से शायद उपर न उठ सके, केंद्र सरकार को क्लीन चिट ज़्यादातर लोगों को पचेंगी नहीं.

फिर इतने लंबे अर्से के बाद अब न तो राम जन्मभूमि आंदोलन की वैसी पकड़ जनमानस पर रही है जैसी विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन कहते थे.

आज न राम नाम पर वोट मिलते है और न युवा मन में मंदिर वहीं बनाने का जज़्बा है.

रोटी कपड़ा मकान और धर्म, आस्था और राजनीति को अलग अलग रखने के ज़माने में रामनाम पर राजनीति के दिन शायद अब लद गए.

तो क्षणिक लाभ या नुक़सान किसी को हो जाए, ये रिपोर्ट किसी नेता की राजनीतिक नैया पार नहीं लगा पाएगी और न ही किसी के राजनीतिक भविष्य को अधर में लटका पाएगी.

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