कोपेनहेगन सम्मलेन में भारत पर दबाव

  • 2 दिसंबर 2009
कोपेनहेगन शिखर सम्मलेन
Image caption कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मलेन सात दिसंबर से होने वाला है.

अगले सप्ताह कोपेनहेगन में होने वाले जलवायु सम्मलेन में समझौते के आसार बढ़ गए हैं. यह मानना है जलवायु परिवर्तन पर बनी संयुक्तराष्ट्र की अंतर्सरकारी समिति यानि आईपीसीसी के प्रमुख आर के पचौरी का.

आर के पचौरी ने कहा कि अमरीका और चीन द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य की घोषणा के बाद अब भारत के ऊपर दबाव बढ़ गया है.

नई दिल्ली में एक प्रेस सम्मलेन को संबोधित करते हुए पचौरी ने कहा कि इस मसले पर "भारत के सामने अब एक दुविधा है" और उसके ऊपर इसी प्रकार की प्रतिबद्धता व्यक्त करने का नैतिक और अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ गया है.

पचौरी ने कहा कि भारत को भी धरती के बढ़ते तापमान को कम करने में अपनी भूमिका को निर्धारित करना होगा.

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने घोषणा की थी कि अमरीका सन् 2020 तक ग्रीनहाउस गैसों में सन् 2005 की तुलना में 17 फ़ीसदी की कटौती करेगा, जब कि चीन ने 40 से 50 फ़ीसदी कटौती का फैसला किया है.

परामर्श

पचौरी ने आशा व्यक्त की कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोपेनहेगन शिखर सम्मलेन में भाग लेने जायेंगे क्योंकि "इससे दुनिया में यह सन्देश जाएगा कि भारत संधि बनाने वाला देश है भंग करने वाला नहीं. साथ ही कोपेनहेगन शिखर सम्मलेन के माध्यम से भारत को अपने सुदूर भविष्य की दिशा तय करने का अवसर मिलेगा."

पचौरी ने सुझाव दिया कि भारत को सौर ऊर्जा और जैव ईंधन से उत्पन्न ऊर्जा का रास्ता अपनाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि अगर कोपेनहेगन सम्मलेन में सभी देश मिलकर 2020 तक पर्यावरणघाती गैसों के उत्सर्जन में 20 फ़ीसदी की कटौती के लक्ष्य पर भी सहमत हो जाते हैं तो धरती के जलवायु के लिए भला होगा.

अगर विकासोन्मुख देश पर्यावरण में आ रहे बदलाव के प्रभावों अनुरूप अपने को ढालने की दिशा में काम करते हैं और सस्ते मूल्य पर पर्यावरणवेदी ग्रीन टेक्नोलोजी के हस्तारण पर सहमत हो जाते हैं तो कोपेनहेगन सम्मलेन सफल होगा.

पचौरी ने कहा कि ग्रीन टेक्नोलोजी अपनाने में भारत का ही अपना भला होगा.

भारतीय पक्ष

लेकिन भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने दिल्ली में कहा कि कोपेनहेगन में ग्रीनहाउस गैसों की कटौती के किसी ऐसे समझौते को भारत नहीं स्वीकार करेगा जो क़ानूनी तौर पर बाध्य हो.

उन्होंने भारत की पारंपरिक नीति को दोहराते हुए कहा कि पर्यावरणघाती गैसों के उत्सर्जन में कटौती का भार अमरीका जैसे विकसित देशों पर है विकासोन्मुख देशों पर नहीं.

भारत में कुछ प्रमुख विपक्षी पार्टियों के नेताओं के इस आरोप का खंडन किया कि विकसित देशों के दबाव में आकर सरकार अपनी पर्यावरण नीति में बदलाव करती रही है.

जयराम रमेश ने कहा कि "हम अपनी नीतियों में कुछ नरमी इस लिए दिखा रहे है क्योंकि हम दुनिया में अलग थलग नहीं होना चाहते हैं. हम संधि में भंग डालने वाली छवि नहीं अर्जित करना चाहते हैं. हम नहीं चाहते कि भविष्य में विश्व हमें दोषी बताए. हम अपने आर्थिक विकास की बलि नहीं चढ़ाना नहीं चाहते. यद्यपि भारत पर्यावरण परिवर्तन की समस्या का कारक नहीं है लेकिन इसका समाधान ज़रूर बनना चाहता है."

कार्बन डाईआक्साइड जैसी पर्वारणघाती ग्रीनहाउस गैसों उत्सर्जन से धरती के जलवायु में परिवर्तन हो रहा है जिससे खाद्यान्न का उत्पाद कम हो रहा है और जगह जगह सूखा, बाढ़ और तूफ़ान जैसे प्रकोप आ रहे हैं.

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