'बातचीत तो हो लेकिन बिना शर्त'

उल्फ़ा के लड़ाके
Image caption असम की स्वतंत्रता के लिए 1979 में उल्फ़ा की स्थापना की गई थी.

भारत में प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन उल्फ़ा की सशस्त्र शाखा के प्रमुख परेश बरुआ ने केंद्र सरकार के साथ बातचीत की इच्छा जताई है.

उनका कहना है कि इसके लिए कोई पूर्व शर्त नहीं होनी चाहिए. बरुआ ने पहले किसी भी तरह की बातचीत का विरोध किया था.

बीबीसी को किसी अज्ञात जगह से टेलीफ़ोन पर दिए साक्षात्कार में परेश बरुआ ने कहा कि उनके संगठन और भारत सरकार के बीच बातचीत हो सकती है बशर्ते दिल्ली उनपर कोई पूर्व शर्त न थोपे.

उन्होंने कहा, ''हम असम की संप्रभुता का मुद्दा उठाना चाहते हैं और केंद्र सरकार चाहती है कि हम भारत की संप्रभुता स्वीकार करें. ज़ाहिर है कि हमारे विचारों में फर्क है जिसे सिर्फ़ बातचीत के ज़रिए ही दूर किया जा सकता है.''

लोगों की आवाज़

उन्होंने कहा कि भारत अगर एक लोकतंत्र है तो असम के लोगों की आवाज़ सुने जाने की अनुमति दी जानी चाहिए.

बरुआ ने कहा, ''बातचीत निश्चित रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष होनी चाहिए. भारत सरकार को असम के लोगों को अपनी भावना स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के लिए जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए.''

बरुआ ने कहा, ''अगर लोग कहते हैं कि वे भारत का अंग बने रहना चाहते हैं तो हम उनके फ़ैसले का सम्मान करेंगे लेकिन जनमत संग्रह स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए और किसी को इसे प्रभावित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए.''

बरुआ ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की दिलचस्पी ओपन नेगोसिएशन यानी खुली बातचीत में है.

उन्होंने कहा, ''वे हमारे संगठन को तोड़ना चाहते हैं. यह इस बात से सिद्ध हो गया है कि पिछले दिनों हमारे अध्यक्ष के साथ क्या हुआ.''

केंद्र सरकार ने इस महीने के शुरू में उल्फ़ा से बातचीत की कोशिश की थी जब बांग्लादेश की खुफ़िया शाखा ने इसके अध्यक्ष अरविंद राजखोवा को पकड़कर उसे सौंप दिया था.

संप्रभुता की माँग

गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संसद में उल्फ़ा की तरफ़ से किसी सकारात्मक बयान की उम्मीद जताई थी. लेकिन राजखोवा के संप्रुभता की माँग छोड़ने से इनकार कर दिया था.

इसके बाद से केंद्र सरकार की इस अलगाववादी संगठन के साथ वार्ता की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा था.

Image caption उल्फा के अधिकांस बड़े नेता इस जेल में हैं केवल परेश बरुआ ही बाहर है.

इसके बाद असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि परेश बरुआ के शामिल न होने की स्थिति में भी उल्फ़ा के साथ बातचीत हो सकती है.

परेश बरुआ ने बीबीसी से कहा, ''ऐसा सवाल मेरे या किसी अन्य के दीमाग में नहीं है. भारत को उल्फ़ा में फूट डालने की कोशिश करने की जगह उसके नेतृत्व के साथ खुले दीमाग से बातचीत करनी चाहिए.''

उल्फ़ा के अधिकांश बड़े नेता इस समय अलग-अलग जेलों में बंद हैं. केवल परेश बरुआ ही बाहर हैं.

भूटान की सेना की ओर से दिसंबर 2003 में चलाए गए एक अभियान में उल्फ़ा के कई नेता या तो मार दिए गए या गिरफ़्तार कर लिए गए थे.

इस महीने के शुरू में बांग्लादेश ने उल्फ़ा के चार बड़े नेताओं अध्यक्ष अरविंद राजखोवा, सशस्त्र शाखा के उप प्रमुख राजू बरुआ, वित्त सचिव चितरंजन हज़ारिका, विदेश सचिव शशाधर चौधरी को पकड़ कर भारत को सौंप दिया था.

बांग्लादेश का विश्वासघात

इसके बाद एक संयुक्त बयान में उत्तर-पूर्व भारत में सक्रिया पाँच अलगाववादी संगठनों ने बांग्लादेश के इस कथित विश्वासघात की निंदा की है.

बयान पर दस्तख़त करने वालों में उल्फ़ा के अलावा नेशनल डेमोक्रेटिक फ़्रंट ऑफ़ बोडोलैंड (एनडीएफ़बी), नेशनल डेमोक्रेटिक फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा(एनडीएफ़टी), आल त्रिपुरा टाइगर फ़ोर्स (एटीटीएफ़) और मणिपुर पीपल्स लिबरेशन फ़्रंट (एमपीएलएफ़) के नाम शामिल हैं.

बांग्लादेश के संबंध में परेश बरुआ ने कहा, ''जो हो गया सो हो गया. हम केवल भारत के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहे हैं किसी अन्य देश के ख़िलाफ़ नहीं.''

उल्फ़ा की स्थापना 1979 में असम की स्वतंत्रता के लिए की गई थी.संगठन की सशस्त्र लड़ाई में अबतक हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी है.

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