अब तक नहीं हो सका कोई समझौता

जलवायु परिवर्तन
Image caption ग़रीब देश नहीं चाहते कि अमीर देशों की मर्ज़ी से कोई समझौता हो जाए

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की अंतिम तिथि ख़त्म होने के बाद भी किसी समझौते को लेकर चर्चाओं का दौर चल रहा है और दुनिया भर के प्रतिनिधि प्रयास कर रहें हैं कि सम्मेलन कहीं बिना किसी समझौते के समाप्त न हो जाए.

इससे पहले अमरीका ने भारत और चीन सहित कुछ प्रमुख विकासशील देशों के साथ मिलकर संभावित समझौते पर सहमति बनाई थी, जिसे राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 'अर्थपूर्ण समझौता' कहा था.

लेकिन इस प्रस्ताव को कुछ विकासशील देशों ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि इस समझौते से ख़तरनाक जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायता नहीं मिलेगी.

इस बीच अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा सहित कई बड़े नेता कोपेनहेगन से रवाना हो गए हैं.

बहुत से देश अभी भी मेज़बान देश डेनमार्क से अनुरोध कर रहे हैं कि वह इस समझौते को स्वीकार कर ले.

लेकिन तकनीकी रुप से किसी भी समझौते को संयुक्त राष्ट्र का अधिकृत समझौता बनाने के लिए ज़रुरी होगा कि सभी 193 देश इसका समर्थन करें.

सहमति

शुक्रवार की शाम अमरीका, चीन, भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका के बीच कई अहम मुद्दों पर एक सहमति बन गई थी.

इसमें एक अहम मुद्दा यह था कि धनी देश तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्शियस तक कम करेंगे.

हालांकि बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता रिचर्ड ब्लैक का कहना है कि इस समझौते में जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया था, उससे ज़ाहिर होता है कि दो डिग्री का यह लक्ष्य कोई औपचारिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि इन देशों का समूह यह मानता है वैज्ञानिक दृष्टि से तापमान को इस सीमा से कम रहना चाहिए.

बराक ओबामा ने कहा कि यह समझौता एक वैश्विक कार्रवाई के लिए आधार बन सकेगा लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि 'अभी बहुत आगे जाना है.'

130 देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे लुमुंबा डायपिंग ने इसे इतिहास का सबसे बुरा प्रस्ताव बताया. उनका कहना था यह मसौदा 'अफ़्रीका को आत्महत्या के पहले लिखे गए पत्र' पर हस्ताक्षर करने जैसा है.

उनका कहना था, "सौ अरब डॉलर का वादा करके कोई हमें अपने महाद्वीप को नष्ट करने के लिए घूस नहीं दे सकता."

प्रशांत महसागार के तटीय देश तुवालु ने विकासशील देशों और अमरीका के बीच बनी सहमति को अस्वीकार्य बताया है.

जद्दोजहद

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के प्रतिनिधि अभी भी नाराज़गी के साथ संभावित समझौते पर चर्चा कर रहे हैं.

इस बात को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है कि मेज़बान देश डेनमार्क के प्रधानमंत्री रासमुसेन किसी अंतिम समझौते पर सहमति की घोषणा कर सकेंगे.

लेकिन बहुत से देशों ने डेनमार्क से अनुरोध किया है कि वह अमरीकी मसौदे को स्वीकार कर ले क्योंकि कोई समझौता न होने से तो यह समझौता बेहतर है.

यूरोपीय आयुक्त जोस मैनुअल बर्रोसो ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा, "मैं अपनी निराशा को छिपाना नहीं चाहता कि क़ानूनी रुप से बाध्यकारी कोई समझौता नहीं हो पा रहा है."

हालांकि उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ अमरीका के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार है.

फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी ने कहा कि जो मसौदा हमारे पास है वह परफ़ेक्ट नहीं है.

लेकिन उन्होंने कहा, "कोई समझौता न होने का मतलब है कि दो महत्वपूर्ण देशों भारत और चीन को किसी भी सहमति के लिए राज़ी हो जाने की स्वतंत्रता देना."

जब कई देशों के नेता कोपेनहेगन से रवाना हो रहे थे, तो ब्रिटेन के ग्रीनपीस के कार्यकारी निदेशक जॉन सॉवेन ने कहा कि कोपेनहेगन एक ऐसी अपराधभूमि की तरह लग रहा है जहाँ से अपराधी स्त्री-पुरुष एयरपोर्ट की ओर रवाना हो रहे हैं.

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