कई देशों ने समझौते को ख़ारिज किया

कोपेनहेगन

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर बैठक अंतिम चरण में है लेकिन किसी समझौते को लेकर संशय बरकरार है.

आख़िरी दिन देर रात तक बैठक जारी है लेकिन विकासशील, ग़रीब और धनी देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति ने जब अपने संबोधन में यह घोषणा कर दी कि भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका और ब्राज़ील के साथ विकसित देशों का गतिरोध ख़त्म हो गया है और ऐतिहासिक सहमति बन गई है, उसके कुछ ही घंटे बाद कई देशों ने इसे ख़ारिज कर दिया.

यहां तक कि कई विकासशील देशों के प्रतिनिधियों ने भी ओबामा की घोषणा पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि अभी कई मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है.

प्रशांत महसागार के तटीय देश तुवालु ने विकासशील देशों और अमरीका के बीच बनी सहमति को अस्वीकार्य बताया है.

यूरोपीय आयुक्त जोस मैनुअल बर्रोसो ने कहा कि समझौता निराशाजनक है. उन्होंने कहा कि कार्बन उत्सर्जन कटौती की क़ानूनी बाध्यता का ज़िक्र किए बिना कुछ नहीं हो सकता और ऐसी स्थिति में बेहतर यही है कि कोई समझौता हो ही न.

130 देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे लुमुंबा डायपिंग ने इसे इतिहास का सबसे बुरा समझौता करार दिया. उनका कहना था कि इस समझौते ने विकासशील देशों को सदा के लिए गरीबी के भँवर में फँसा दिया है.

हालाँकि यूरोपीय प्रतिनिधि इस समझौते को सकारात्मक बता रहे हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन एजेंसी के प्रमुख यूवो डे बोए ने कहा है कि अन्य देश समझौते को स्वीकार कर लें तभी सम्मेलन को सफल माना जा सकता है.

सार्थक सहमति

इससे पहले एक अमरीकी अधिकारी ने कहा कि कोपेनहेगन सम्मेलन में शामिल प्रमुख देशों में जलवायु परिवर्तन पर 'सार्थक सहमति' हो गई है.

अधिकारी का कहना है कि अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा के बीच सहमति हो गई है.

उन्होंने माना कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यह समझौता पर्याप्त नहीं है लेकिन यह पहला महत्वपूर्ण क़दम है. उन्होंने कहा कि कोई भी देश इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं है लेकिन आगे की प्रगति के लिए यह आधार है.

जानकारों ने इस समझौते का स्वागत तो किया है लेकिन साथ ही ये भी कहा है कि इससे कम ही उपलब्धि हासिल होगी. कोपेनहेगन में मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझौता हो पाया है या नहीं.

आधार

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यह समझौता एक आधार होगा, लेकिन उन्होंने यह भी माना कि इस मुद्दे पर अभी और आगे जाना है.

उन्होंने कहा, "आज हमने कोपेनहेगन में सार्थक और बेमिसाल उपलब्धि हासिल की है. इतिहास में पहली बार दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ एक साथ आई हैं और उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार की है. ताकि जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिए कार्रवाई की जा सके."

उन्होंने कहा कि अमरीका, चीन, ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ़्रीका ग्लोबल वॉर्मिंग को दो सेल्सियस से ज़्यादा न रखने के लक्ष्य पर सहमत हो गए हैं. साथ ही ये देश इस दिशा में कार्रवाई के लिए भी तैयार हैं.

ओबामा ने कहा, "मैंने चीन, भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका के नेताओं से मुलाक़ात की. बातचीत में हम सब इस पर सहमत हुए कि हम अपने वादे और उस पर की जाने वाली कार्रवाई को सामने रखेंगे. हम इसे लागू करने के बारे में सूचनाएँ देंगे. इसके लिए स्पष्ट तौर पर दिशा-निर्देश होगा, जिसके तहत इनका विश्लेषण भी होगा. "

राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि ग्लोबल वॉर्मिंग को दो सेल्सियस से ज़्यादा न रखने के लक्ष्य पर भी सहमत हो गए हैं और इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कार्रवाई भी होगी.

हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ये सिर्फ़ पहला क़दम है.

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कम विकसित देशों को सहायता देने पर भी सहमति हो गई है.

'बाध्यकारी क़ानून फ़िलहाल नहीं'

यह भी माना जा रहा है कि दुनिया के देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर निगरानी के लिए भी तैयार हो गए हैं.

ओबामा ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन पर बाध्यकारी क़ानून वाले समझौते में अभी समय लगेगा. बाध्यकारी क़ानून वाले समझौते पर भारत समेत कई विकासशील देशों को आपत्ति थी.

कोपेनहेगन सम्मेलन में सहमति के लिए दुनिया के शीर्ष नेता तय समयसीमा से भी ज़्यादा समय तक विचार-विमर्श करते रहे.

समझौते की ख़बर आने के बाद पर्यावरण अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि समझौते की जो ख़बर आ रही है, वो कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में काफ़ी कम है.

दो सप्ताह तक चले इस सम्मेलन के दौरान दुनियाभर के नेता समझौते की कोशिश में लगे रहे.

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