'कोपेनहेगन समझौता एक शुरुआत'

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि कोपेनहेगन सम्मलेन के नतीजे सबकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं लेकिन इसे एक 'ज़रूरी शुरुआत' माना जा सकता है.

उन्होंने कहा, "हो सकता है कि हम जो चाहते हों, वो हमें न मिला हो लेकिन इस समझौते को एक शुरुआत तो माना ही जा सकता है."

दो सप्ताह तक चले विचार-विमर्श के बाद कोपेनहेगन सम्मेलन बिना किसी बाध्यकारी क़ानून वाले समझौते के समाप्त हो गया.

सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने अमरीका और कुछ प्रमुख विकासशील देशों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करने से मना कर दिया.

हालाँकि उन्होंने इस समझौते पर विचार करने के पक्ष में मतदान किया. कई ग़रीब देशों ने इस पर नाराज़गी व्यक्त की है कि उन्हें शामिल किए बिना ही समझौता कर लिया गया.

इन देशों का कहना है कि इस समझौते में कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य काफ़ी कम है.

आरोप-प्रत्यारोप

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि कोपेनहेगन सम्मेलन नाकामी और मौक़ा चूक जाने के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच ख़त्म हो गया है.

Image caption बान की मून ने इसे ज़रूरी शुरुआत बताया है

शुक्रवार देर रात अमरीका और कुछ प्रमुख विकासशील देशों के बीच जो समझौता हुआ है, उसके मुताबिक़ तापमान में बढ़ोत्तरी को दो सेल्सियस से भी कम रखने की बात कही गई है.

साथ ही अगले तीन वर्ष के दौरान विकासशील देशों को 30 अरब डॉलर की सहायता देने का वादा भी किया गया है.

इस समझौते के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ग़रीब देशों को 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर की सहायता देने की भी बात कही गई है.

समझौते में कार्बन उत्सर्जन में कमी के विकासशील देशों के वादे की निगरानी की प्रक्रिया तय करने का भी ज़िक्र है.

पहले चीन इसका विरोध कर रहा था लेकिन अमरीका के ज़ोर देने पर वो भी इसके लिए तैयार हो गया है.लेकिन अमरीका और कुछ प्रमुख विकासशील देशों के बीच हुए इस समझौते को लेकर कई देश नाराज़ हैं.

निकारागुआ और वेनेज़ुएला जैसे कई दक्षिण अमरीकी देशों का कहना है कि बिना किसी उचित प्रक्रिया के यह समझौता हुआ है. सम्मेलन की समाप्ति पर सिर्फ़ ये प्रस्ताव पारित हुआ कि ये सम्मेलन समझौते पर विचार करेगा.

पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं और सहायता एजेंसियों ने इस समझौते को 'नाकाम और दंतहीन' समझौता कहा है.

ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल के रॉबर्ट बेली ने कहा, "सम्मेलन को बचाने में देरी हो गई थी. लेकिन इस दुनिया और यहाँ के लोगों को बचाने में ज़्यादा देर नहीं हुई है."

कोपेनहेगन समझौता अमरीका के नेतृत्व में पाँच देशों के एक ग्रुप के बीच हुआ है. इस ग्रुप में चीन, भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका शामिल हैं.

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