आशूरा पर करबला में लोगों का ताँता

आशुरा
Image caption आशुरा के मौक़े पर शिया मुसलमान शोक मनाते हैं

आशूरा के मौक़े पर लाखों शिया मुसलमान इराक़ के शहर करबला में इकट्ठा हो रहे हैं.

इस मौक़े पर शिया मुसलमान पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं.

पिछले कुछ सालों में शियाओं पर हुए हमलों के चलते सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई है.

हज़ारों पुलिसकर्मी और सेना के जवान प्रशिक्षित कुत्तों के साथ सड़कों पर तैनात किए गए हैं. साथ ही महिला स्वयंसेवकों को भी महिलाओं की तलाशी के लिए तैनात किया गया है ताकि किसी भी तरह की विस्फोटक सामग्री कोई न ले जा सके.

इससे पहले उत्तरी इराक़ के किरकुक शहर में आशूरा मना रहे चार लोगों की सड़क के किनारे रखे एक बम के फट जाने से मौत हो गई.

इस बीच ईरान में आशूरा मनाने के लिए जुटे प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच ताज़ा संघर्ष होने की ख़बरें आ रही हैं.

विपक्षी दलों की वेबसाईटों के मुताबिक़ तेहरान में सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया और उन्हें रोकने के लिए शहर की तमाम सड़कों को बंद कर दिया.

बीबीसी के तेहरान संवाददाता के अनुसार ईरान के तमाम शहरों में छिटपुट विरोध प्रदर्शन के बाद विपक्ष इस मुद्दे को सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में प्रदर्शित करना चाहता है.

शनिवार को तेहरान में एक विपक्षी नेता और पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी ने बेहद जोशीला भाषण दिया था और उसके बाद ही विपक्षी कार्यकर्ताओं और अधिकारियों के बीच संघर्ष शुरू हो गया.

आशूरा का महत्व और इतिहास

आशूरा के दिन या 'यौमे आशूरा' का सभी मुसलमानों के लिए महत्व है लेकिन शिया मुसलमानों के लिए इसकी ख़ास अहमियत है.

यह दिन मोहर्रम की 10वीं तारीख़ है जो इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से साल का पहला महीना है.

आशूरा करबला में इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है. इमाम हुसैन पैंगंबर हज़रत मोहम्मद के नवासे थे.

शिया मुसलमान इस दिन उपवास रख कर उस घड़ी को याद करते हैं.

इस दिन ताज़िए निकाल कर और मातम कर के 680 ईस्वी में आधुनिक इराक़ के करबला शहर में हुसैन की शहादत का ग़म मनाया जाता है. कहीं-कहीं यह मातम ज़ंजीरों और छुरियों से भी किया जाता है जब श्रद्धालु स्वंय को लहूलुहान कर लेते हैं.

हाल में कुछ शिया नेताओं ने इस तरह की कार्रवाइयों को रोकने की भी बात कही है और उनका कहना है कि इससे बेहतर है कि इस दिन रक्तदान कर दिया जाए.

हुसैन की शहादत ही वह मौक़ा था जब शिया और सुन्नी धड़ों के बीच ज़बरदस्त खाई पैदा हो गई.

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