ओसामा: ज़िंदा या मुर्दा

  • 10 जनवरी 2010
Image caption ओसामा बिन लादेन के वीडियो टेपों की प्रामाणिकता पर संदेह

ओसामा बिन लादेन आठ साल पहले या तो अफ़ग़ानिस्तान के तोरा बोरा इलाक़े में हुई लड़ाई में मारे गए या फिर गुर्दे की बीमारी ने उनकी जान ले ली.

ये एक ऐसी परिकल्पना है, जिसपर बीबीसी ने एक विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया है.

11 सितंबर 2001 को अमरीका पर हुए हमलों के बाद से ये अनुमान लगाए जाते रहे हैं कि अमरीकी ख़ुफ़िया विभाग अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई को न्यायोचित ठहराने के लिए जब तब बिन लादेन के वक्तव्य जारी करता रहता है जिससे बिन लादेन का भूत ज़िंदा रहे.

तो दुनिया को जिस आदमी की सबसे ज़्यादा तलाश है क्या वह जीवित है ?

ये शक इसलिए पैदा होता है क्योंकि ओसामा बिन लादेन दुनिया की महाशक्तियों को चकमा देकर और बड़े पैमाने पर हो रही तलाश के बावजूद पिछले 10 साल में सबको झांसा देने में कामयाब रहे हैं.

राष्ट्रपति बराक ओबामा की अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान नीति की समीक्षा करने वाले दल के अध्यक्ष ब्रूस रेडैल कहते हैं, "हमें कुछ पता नहीं वो कहाँ है."

और किसी ठोस ख़ुफ़िया जानकारी के अभाव में ओसामा बिन लादेन का मिथक और अफ़वाहों में घिर गया है.

'ओसामा के टेप जाली '

पिछले कई सालों में ओसामा बिन लादेन के कितने ही ऑडियो और वीडियो टेप जारी किए गए हैं लेकिन उनकी प्रामाणिकता पर हमेशा सवाल उठाए जाते रहे हैं.

ब्रह्मविद्या के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर डेविड रे ग्रिफ़िन सभी वीडियो की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हैं. यही नहीं वो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों के कुछ हवालों पर भी सवाल उठाते हैं.

प्रोफ़ेसर ग्रिफ़िन कहते हैं, "अभी तक जारी टेपों में तीन ऐसे हैं जिनको जाली साबित किया जा सकता है. और अगर कोई बिन लादेन के जाली वीडियो बना रहा है तो यह शक होना स्वाभाविक है कि बाक़ी के टेप भी जाली होंगे."

पहला वीडियो टेप दिसंबर 2001 में अमरीका के प्रतिरक्षा विभाग ने जारी किया था जिसमें बिन लादेन 11 सितंबर के हमलों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते दिखाई देते हैं.

लेकिन प्रोफ़ेसर ग्रिफ़िन का तर्क है कि अल क़ायदा ने शायद ही कभी आतंकवादी हमलों की ज़िम्मेदारी स्वीकार की हो.

उनका ये भी कहना है कि इस टेप में बिन लादेन पहले के मुक़ाबले मोटे दिखाई देते हैं, उनकी उंगलियां भी छोटी हैं और वो ग़लत हाथ से लिख रहे हैं.

अक्तूबर 2004 में अमरीका में हुए राष्ट्रपति चुनाव से पहले जो वीडियो जारी किया गया उसमें धार्मिक व्याख्यान का अभाव था.

प्रोफ़ेसर ग्रिफ़िन का मानना है कि इस वीडियो ने जॉर्ज बुश की दूसरी बार जीत सुनिश्चित कर दी.

पश्चिमी षड़यंत्र

लेकिन सबसे अधिक सवाल उठते हैं सितंबर 2007 में जारी हुए तीसरा वीडियो टेप पर.

Image caption विशेषज्ञों ने ओसामा बिन लादेन के विभिन्न वीडियो टेपों की जांच की है

इस टेप में बिन लादेन की खिचड़ी दाढ़ी के स्थान पर काली दाढ़ी दिखाई देती है और कई जगह उनकी तस्वीर तो स्थिर हो जाती है लेकिन आवाज़ आती रहती है.

अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के एक भूतपूर्व अधिकारी रॉबर्ट बेयर भी इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हैं लेकिन यह नहीं मानते कि इसके पीछे पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों का हाथ है.

उनका मानना है कि स्वयं अल क़ायदा ने यह जाली वीडियो बनाया है.

बीबीसी ने ब्रिटन की वायुसेना के एक भूतपूर्व छाया विश्लेषक ऐंडी लॉज़ को 1998 में जारी किए गए बिन लादेन के वीडियो टेप की न्यायिक जाँच करने और कथित जाली टेपों से उसकी तुलना करने को कहा.

ऐंडी लॉज़ का कहना है कि बिन लादेन इसलिए मोटे दिखाई दे रहे हैं क्योंकि एडिटिंग की प्रक्रिया में जब सब-टाइटिल्स जोड़े जाते हैं तो छवि दब जाती है.

उनका कहना है कि तीनों वीडियो एक ही व्यक्ति के हैं बिन लादेन के. ऐंडी लॉज़ कहते हैं, "यह बड़ा मुश्किल है कि अमरीकी सेना जाली टेप बनाए और किसी को पता न चले."

ऐंडी लॉज़ कहते हैं, "तकनीक की दृष्टि से आज के ज़माने में इस तरह के वीडियो बनाना संभव है लेकिन चुपचाप नहीं. क्योंकि इस प्रक्रिया में बहुत से लोग शामिल होते हैं और अब तक किसी न किसी स्रोत से बात बाहर निकल आती."

अमरीका पर हुए हमलों के बाद से बिन लादेन के कोई 40 वक्तव्य सामने आ चुके हैं. पिछले साल आए दो वक्तव्यों में राष्ट्रपति बराक ओबमा की चर्चा थी.

सीआईए के भूतपूर्व अधिकारी माइक श्योर मानते हैं कि ओसामा बिन लादेन ज़िंदा हैं.

उनका कहना है कि ओसामा के ऑडियो टेपों में ताज़ा हालात का ज़िक्र होता है. अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और ब्रिटन की सरकार के संपर्क मुख्यालय दोनों आवाज़ पहचानने की महारत रखते हैं.

माइक श्योर का तर्क है कि अगर ये बिन लादेन की आवाज़ नहीं है तो ये दोनों एजेंसियां अपनी-अपनी सरकारों को इस बात की जानकारी ज़रूर देतीं.

सीआईए के एक और अधिकारी आर्ट कैलर कहते हैं कि किसी भी चीज़ को षड़यंत्र कह देना आसान है जबकि सच्चाई का सामना करना मुश्किल है.

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