धार्मिक हिंसा में सैकड़ों मरे

जॉस में नमाज
Image caption फ़िलहाल सुरक्षाबलों ने स्थिति संभाल ली है मगर तनाव बरक़ररार है

अफ़्रीकी देश नाइजीरिया में पिछले सप्ताह जॉस नामक एक शहर में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा की तस्वीर अब साफ़ हो रही है और मारे गए लोगों की संख्या तीन सौ या उससे भी अधिक हो सकती है.

पिछले रविवार को जॉस में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच हिंसा भड़कने के बाद कई घंटों तक ख़ून ख़राबा होता रहा.

अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने हिंसा की आपराधिक जाँच करवाने की माँग की है और कहा है कि उसके पास इस बात के विश्वसनीय प्रमाण हैं कि वहाँ मुसलमानों का जनसंहार हुआ है.

मध्य नाइजीरिया के प्लेटो राज्य की राजधानी जॉस में पहले भी सांप्रदायिक हिंसा हो चुकी है. वर्ष 2001 और 2008 में भी वहाँ बड़े गंभीर दंगे हुए थे.

नाइजीरिया का उत्तरी हिस्सा मुस्लिम बहुल और दक्षिणी ईसाई बहुल है.

जॉस शहर उत्तरी और दक्षिणी नाइजीरिया के बीच में पड़ता है जहाँ मुसलमानों और ईसाइयों के बीच वर्चस्व के लिए संघर्ष होता रहता है.

लाशें

Image caption जॉस शहर में इससे पहले भी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हो चुकी हैं

जॉस में हिंसा के एक सप्ताह बाद ख़बर आ रही है कि राहत कर्मियों को वहाँ कुओं और नालों से शव मिल रहे हैं.

जॉस शहर से 30 किलोमीटर दूर कुरू करामा नामक एक गाँव से डेढ़ सौ लाशें बरामद की गई हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि 19 जनवरी को सशस्त्र लोगों ने मुस्लिम बहुल कुरू करामा पर हमला बोल दिया और वहाँ घरों और एक मस्जिद में छिपे लोगों को हथियारों से और जलाकर मार डाला.

जॉस स्थित कुछ मुस्लिम अधिकारियों ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया है कि हिंसा में 364 मुसलमान मारे गए हैं.

हज़ारों की संख्या में लोग घरों से भाग गए हैं.

शहर के एक प्रमुख व्यवसायिक क्षेत्र में कम-से-कम एक हज़ार दुकानों और मकानों को जला दिया गया है.

जाँच

ह्यूमन राइट्स वॉच ने नाइजीरिया के उपराष्ट्रपति गुडलक जोनाथन से तत्काल इस हिंसा की जाँच करवाने की माँग की है.

नाइजीरिया के राष्ट्रपति उमारू यारादुआ बीमार हैं और उनका सउदी अरब में इलाज चल रहा है.

उनकी जगह पर सरकार चला रहे उपराष्ट्रपति ने हिंसा भड़कने के चार दिन बाद सुरक्षाबल भेजा.

सुरक्षाबलों ने स्थिति नियंत्रित कर ली है मगर संवाददाताओं का कहना है कि अभी भी माहौल तनावपूर्ण है.

वर्चस्व की लड़ाई

उत्तरी और दक्षिणी नाइजीरिया के बीच में पड़नेवाले शहर जॉस में मुसलिम और ईसाई अलग-अलग रहा करते हैं.

वहाँ दशकों से रह रहे मुसलमानों को अभी भी बाहर का समझा जाता है जिससे वे चुनाव में नहीं खड़े हो सकते.

इसके अलावा वहाँ ईसाई सत्ताधारी दल के समर्थक हैं जबकि मुसलमान विपक्ष के साथ रहते हैं.

जॉस के कैथोलिक गिरजाघर के आर्चबिशप इग्नेशियस काइगामा ने बीबीसी से कहा कि हिंसा की असल वजह धर्म नहीं बल्कि राजनीति और ग़रीबी है.

उन्होंने कहा,"नाइजीरियाई लोग अपने चर्चों को प्यार करते हैं, मस्जिदों को प्यार करते हैं, तो यदि कोई राजनेता समस्या खड़ी करना चाहता है, मगर नहीं जानता कि ये कैसे हो, तो उसके लिए सबसे आसान यही है कि वह ये दावा करने लगे कि उसके धर्म के कारण उसके साथ भेदभाव हो रहा है, इससे भावनाएँ आसानी से भड़कती हैं. यही हो रहा है, धर्म को हथियार बनाया जा रहा है."

आर्कबिशप ने कहा कि जब तक इस समस्या का कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकलता तबतक हिंसा के ये चक्र चलता रहेगा.

उनके अनुसार रास्ता यही है कि गुमराह और बेकार युवाओं के लिए काम की व्यवस्था हो और समुदायों के बीच संवाद स्थापित कराया जाए ताकि सब ये महसूस करें कि वे सबसे पहले नाइजीरियावासी हैं.

संबंधित समाचार