शोपियाँ पर सीबीआई की सफ़ाई

शोपियाँ में शोकग्रस्त महिलाएँ
Image caption शोपियाँ के लोगों का आरोप है कि मृत महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ फिर उनकी हत्या कर दी गई

भारत की केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई ने भारत में काम कर रहे विदेशी पत्रकारों को बुलाकर चर्चित शोपियाँ मामले में अपनी तहकीकात के बारे में विस्तृत जानकारी दी है.

हालांकि भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ का मामला इस वक्त चर्चा में नहीं है, लेकिन पिछले साल मई में जब ये घटना हुई थी तब शोपियाँ 47 दिनों के लिए बंद रहा था और उस समय स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए थे.

मामले पर राज्य विधानसभा में भी गर्मागर्मी हुई और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को इस्तीफ़ा देना पड़ा, हालांकि राज्यपाल ने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया.

अंत में सरकार ने मामले को सीबीआई को सौंप दिया.

सीबीआई की जांच अभी जारी है, ऐसे में सिर्फ विदेशी पत्रकारों के जाँच की विस्तृत जानकारी देने के लिए बुलाया जाना पत्रकारों को भी अजीब लगा. सीबीआई से इस बारे में सवाल किए जाने पर कोई सीधा जवाब नहीं मिला.

पिछले साल 29 मई को शोपियाँ में दो महिलाओं की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी. इस घटना की पड़ताल पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस ने की और उसके बाद सीबीआई इसकी जाँच कर रही है.

14 दिसम्बर, 2009 को जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की खंडपीठ के सामने पेश अपनी रिपोर्ट में सीबीआई ने कहा था कि दोनों महिलाओं के साथ न तो बलात्कार हुआ था और न ही उनकी हत्या की गई, बल्कि उनकी मौत डूबने से हुई थी.

सीबीआई की दलील

अपनी रिपोर्ट के समर्थन में सीबीआई ने गुरुवार को पत्रकारों के सामने कई तथ्य पेश किए.

सीबीआई के मुताबिक़ मामले की तहकीकात में पता चला कि दोनों महिलाओं - नीलोफर और आसिया जान के शवों पर मारपीट के कोई निशान नहीं थे और उनके कपड़े भी ठीक थे.

हालांकि मामले की जाँच की शुरुआत से ही स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस या सुरक्षाबलों ने दोनों महिलाओं के साथ बलात्कार किया और फिर उनकी हत्या कर दी.

शोपियाँ में इस मामले की जांच कर चुके महिलाओं के एक स्वायत्त दल के मुताबिक़ आसिया के आधे बदन पर कपड़े नहीं थे, और कई चोट के निशान भी थे.

खास तौर पर आसिया के मामले में सीबीआई ने कहा कि गुप्तांगो की जांच से ये पुष्टि हो गई है कि उनके साथ बलात्कार नहीं किया गया था.

वहीं स्वायत्त दल की एक सदस्य अनुराधा भसीन सवाल करती हैं, "सीबीआई ने अपनी तहकीकात शवों के दफनाए जाने के 4 महीने बाद की. हमने कई डॉक्टरों से बात की, जिन्होंने ये साफ़ किया कि इतने लम्बे समय में गुप्तांगों में इतनी सड़न पैदा हो जाती है कि उनकी जांच नहीं की जा सकती. तो हम उनकी बात कैसे मान लें?"

इस मामले में दो गवाहों की अहम भूमिका है. इन गवाहों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस को ये बयान दिया था कि उन्होंने एक पुलिस की जीप से दो महिलाओं के चिल्लाने की आवाज़ें सुनी थीं.

लेकिन सीबीआई की तहकीकात में वो अपने बयान से मुकर गए.

सीबीआई के मुताबिक़ इन गवाहों पर वकीलों का दबाव था और इसलिए उन्होंने पहले झूठे बयान दिए थे.

लेकिन अनुराधा भसीन कहती हैं, "इनमें से एक गवाह से उनके दल के सदस्य अकेले में मिले थे और उस गवाह ने वही बातें कही जो उसने अपने पहले बयान में दी थीं."

अनुराधा का कहना है कि गवाहों पर कोई दबाव नहीं था.

सीबीआई का कहना है कि दोनों महिलाओं की मौत नाले में डूबने से हुई.

लेकिन स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस नाले का जलस्तर काफी कम है.

अपनी बात के समर्थन में सीबीआई ने जम्मू-कश्मीर के सिंचाई और योजना विभाग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मई के महीने में नाले में जल स्तर बढ़ जाता है.

स्वायत्त दल की अनुराधा भसीन के अनुसार पिछले 20 साल में उस नाले में डूब के किसी की मौत होने का एक भी मामला सामने नहीं आया है.

शोपियाँ मामला

Image caption शोपियाँ में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें भी हुई थीं

नीलोफ़र और आसिया के शव 30 मई को शोपियाँ के रनबियारा नाले में मिले थे.

इस घटना से पूरी कश्मीर घाटी में आक्रोश इतना बढ़ा कि घाटी में आठ दिनों तक बंद रखा गया जिसके दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर झड़पें हुईं और हिंसा में दो प्रदर्शनकारी मारे गए.

इस मामले की तहकीकात पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस ने की. लेकिन जांच के दौरान बदलते बयानों और मेडिकल सबूतों के साथ छेड़छाड़ की शिकायतें सामने आईं.

मामले की जांच के लिए जस्टिस जान की कमीशन को बैठाया गया.

कमीशन ने चार पुलिस कर्मियों को दोषी पाया और उनको हिरासत में भी लिया गया.

लेकिन इसके बाद सीबीआई ने मामले की जांच की और पुलिसवालों के ख़िलाफ़ सबूतों का अभाव बताते हुए उन्हें बरी कर दिया गया.

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