अफ़ग़ान सिख अनारकली कौर की 'जंग'

डॉक्टर अनारकली कौर होनारियार
Image caption डॉ. अनारकली कौर होनार्यर कहती है की अफ़ग़ानिस्तान का क़ानून महिलाओं की ख़िलाफ है.

अनारकली कौर होनारियार अफ़ग़ानिस्तान की एक ऐसी सिख महिला हैं जो बचपन से पायलट बनने का सपना देखा करती थीं.

उनका वो सपना तो पूरा नहीं हो सका लेकिन आज वो अफ़ग़ान महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली एक प्रमुख कार्यकर्ता के रूप में पहचानी जाती हैं.

काबुल में अफ़ग़ान इंडिपेंडेंट ह्यूमन राइट्स कमीशन के दफ़्तर में उन्होंने मुझे बताया, "अफ़ग़ानिस्तान में किसी महिला के लिए पायलट बनना बहुत मुश्किल है. पिता जी कहा करते थे कि ये देश की संस्कृति से मेल नहीं खाता है."

ऊँची उड़ान भरने की चाह रखने वाली इस महिला ने एक मायने में पायलट बनने से भी मुश्किल काम करने की चुनौती को स्वीकार किया.

अनारकली कौर पुरुषप्रधान समाज में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहीं हैं. यह ऐसा समाज है जहाँ अनेक महिलाएँ बुर्के में ही पूरी ज़िंदगी बिता देती हैं.

मई 2009 में 25 वर्षीय अनारकली को रेडियो फ़्री यूरोप के अफ़ग़ान अध्याय ने 'पर्सन ऑफ़ द ईयर' सम्मान के लिए चुना. इसके बाद इनका नाम काबुल के घर-घर मे जाना जाने लगा.

अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब 3000 हिंदू-सिख आबादी है.

अनारकारी पेशे से दांतों की डॉक्टर हैं.

वर्ष 1991 में अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध शुरु होने के बाद से इस समुदाय की संख्या घटी है और इनकी माली हालत भी ख़राब हुई है.

इससे पहले काबुल, कंधार और अन्य शहरों में क़रीब 50 हज़ार सिख-हिंदू रहते थे और सफल व्यपारी थे. लेकिन हिंसा शुरु होने के बाद इनमें से अधिकतर भारत, यूरोप और कनाडा के सुरक्षित स्थानों पर चले गए.

अब वो उन लोगों के मानवाधिकारों के लिए अभियान चलाती हैं जो अफ़ग़ानिस्तान में रह गए. इसमें इन समुदायों के मृतकों के लिए पारंपरिक तरीके से अंतिम संस्कार करने की व्यवस्था उपलब्ध कराना शामिल है.

उनका कहना है, "अभी भी कुछ लोगों का मानना है कि हम विदेशी हैं और हम भारतीय यहां कुछ समय के लिए काम करने के लिए रह रहे हैं. लेकिन हम भी अफ़ग़ान हैं और हमें भी वो सभी अधिकार और अवसर मिलने चाहिए जो अन्य अफ़ग़ान नागरिकों को मिले हुए हैं."

तालेबान के दौर में परवरिश

Image caption सभी अफ़ग़ानी लड़कीयों को शिक्षा मिलना मुश्किल है

अशांत माहौल में पली-बढ़ी अनारकली कौर की परवरिश बग़लान प्रांत में 1990 के दशक में हुई. तब वहाँ क़बायली नेताओं का बोलबाला था.

बग़लान जैसे कई प्रांतों पर तालेबान का कब्ज़ा होता जा रहा था.

अनारकली के लिए तब स्थिति और ख़राब हो गई जब तालेबन के गढ़ में लड़कियों के स्कूल को बंद कर दिया गया और धार्मिक अल्पसंख्यकों को कट्टर सुन्नी मुसलमानों से धमकी मिलने लगी.

वे भाग्यशाली रहीं कि बग़लान तक तालेबान की पहुंच नहीं थी और उन्होंने समय से चार साल पहले हाई स्कूल से परीक्षा पास कर ली.

अनारकली कहती हैं, "मैं अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए माता-पिता से मिले समर्थन के लिए उनकी आभारी हूँ. लेकिन सभी अफ़ग़ान लड़कियाँ इतनी सौभाग्यशाली नहीं हैं."

वर्ष 2001 में जब तालेबन को सत्ता से बेदख़ल किया गया तब अनारकली ने काबुल जाकर काबुल विश्वविद्यालय में मेडिकल की पढ़ाई की. उन्होंने उस लोया जिरगा में भी भाग लिया जिसमें तालेबान की जगह अंतरिम सरकार का चयन हुआ. लोया जिरगा अफ़ग़ानिस्तान के क़बायली नेताओं और प्रतिनिधियों की वो पारंपरिक महापंचायत है जो क़ौम के बारे में अहम फ़ैसले करती है.

उनका कहना है, "तालेबान के समय के मुकाबले में आजकल महिलाओं की स्थिति बेहतर हुई है. यदि राष्ट्रपति हामिद करज़ई हमारी बात न सुनें तो हम मानवाधिकार संगठनों के सामने अपील तो कर ही सकते हैं."

वे वर्ष 2006 में अफ़ग़ान इंडिपेंडेंट ह्यूमन राइट्स कमीशन से जुड़ गईं.

वे सैंकड़ों अफ़ग़ान महिलाओं से मिलती हैं और उनकी समस्याएँ सुनती हैं. उनका कहना है, "वे लोग जानते हैं कि मैं सिख हूँ, पर उन लोगों को मुझ पर पूरा विश्वास है और वो अपनी अत्यंत निजी समस्याओं के बारे में भी मुझपर विश्वास करती हैं. यहाँ की संस्कृति जैसे पूरी तरह महिलाओं के खिलाफ़ है. हम इनकी समस्याओं को हल करने की कोशिश करते हैं लेकिन हमें क़ानूनों में बदलाव लाने की ज़रूरत भी है."

महिलाओं की साक्षरता दर 20 फ़ीसदी से भी कम है.

अनारकली कौर कहती हैं, "क़ानूनों को जानने की ज़रूरत है. अफ़ग़ानिस्तान के क़ानूनों के मुताबिक कोई पति अपनी गर्भवती महिला को तलाक़ नहीं दे सकता है. उसे बच्चा पैदा होने के दो महीने बाद तक रुकना पड़ेगा. ऐसी एक महिला को उनका अधिकार दिलाने में हमनें मदद की थी."

वे कहती हैं कि वे भारतीय पंजाब में सिखों के पावन स्थल अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर जाना चाहती हैं....और ताज महल भी देखना चाहती हैं.

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