इरिट्रियाई आंदोलन में 25 प्रतिशत महिलाएं

  • 22 फरवरी 2010
मरियम उमर
Image caption मरियम उमर ने 1976 में अपने सैन्य जीवन की शुरूआत की

मरियम उमर ने इथियोपिया से आज़ादी हासिल करने के लिए इरिट्रियाई संघर्ष में भाग लिया था. वह 13 की आयु में ही सैनिक बन चुकी थीं. उसके बाद उन्होंने अपने जीवन का अगले 16 वर्ष ख़ौफ़नाक छापामार युद्ध में गुज़ारे.

मरियम उमर ने एक सैनिक के तौर पर 1976 में अपने सैन्य जीवन की शुरूआत की.

उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "मैंने अपने आप को एक मक़सद के लिए पेश किया. मुझे लगता था कि मुझे कुछ करना चाहिए."

मरियम ने कहा, "राजनीतिक माहौल काफ़ी गर्माया हुआ था. मैंने गांवों को जलते हुए देखा था. मैं चारों ओर से युद्ध में घिरी हुई थी. सरकार बहुत से लोगों को क़ैद कर रही थी. उनमें से एक मेरे पिता थे."

वह जब छठी कक्षा में थी जब उन्होंने वो मंज़र देखा था कि उनके पिता को घर से घसीट कर निकाला गया और एक वैन के पीछे फेंक दिया गया.

उन्हें कड़ी सुरक्षा वाले जेल में ले जाया गया जहां उनका उत्पीड़न किया गया और उसके बाद उन्होंने कभी अपने पिता को नहीं देखा.

मरियम का कहना है, "मुझे इस बात का इतना दुख था कि मेरे पिता जेल में हैं, वह मेरे आदर्श थे और मैं सहन नहीं कर सकती थी. मेरे अंदर भी वही भावना जागी जो किसी भी पुरूष या महिला में जागती है और वह बदले की भावना थी."

बराबरी

मरियम उमर की कहानी असाधारण है लेकिन अनूठी नहीं.

कहा जाता है कि इरिट्रिया की स्वतंत्रता के पॉपुलर फ़्रंट या इपीएलएफ़ के बाग़ियों में एक चौथाई महिलाएं थीं और उनमें से कई सारी किशोरवय लड़कियां थीं.

उन्होंने पारंपरिक जीवन छोड़ दिया क्योंकि उन्हें मालूम था कि मार्क्सवाद से प्रेरित यह छापामार पुरूषों और महिलाओं में बराबरी के समर्थक हैं.

मरियम उमर ने नौ महीने का सैन्य प्रशिक्षण लिया

उन्होंने कहा, "इसके बाद मैं मानसिक और शारीरिक तौर पर बंदूक़ उठाने लायक़ हो गई."

उन्हें आज भी स्पष्ट तौर से याद है कि युद्ध करना कैसा था, "युद्ध में आप उतने ही आक्रामक और निर्दयी होते हैं जितने के पुरूष. शारीरिक तौर पर हम पुरूष के बराबर नहीं थे, लेकिन पुरूष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में लड़ने के लिए हम अपनी कोशिश दुगनी कर देते थे."

टैंक कमांडर

वह याद करती हैं कि किस प्रकार कभी महिला होना कोई समस्या नहीं बनी.

उन्होंने बताया, "हमें बराबरी के साथ काम दिया जाता था, पुरूषों की तरह ही अगली पंक्ति में, महिलाएं क्रांति में काफ़ी महत्वपूर्ण थी."

संगठन का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन लाना था और यह बिना महिलाओं की भागीदारी के संभव नहीं था, फ़ौजी को खाना खिलाने से लेकर उन्हें ख़बर देना और सहायता करना सब शामिल था.

वह कहती हैं, "यही कारण था कि उन्होंने अपने सैन्य क़ानून में महिलाओं के अधिकार को शामिल किया था. वास्तव में महिलाओं की भूमिका ने पुरूषों के रवैये में बदलाव पैदा कर दिया था."

हज़ारों जवान महिलाओं ने आंदोलन में भाग लिया. उनमें से कुछ तो टैंक टुकड़ी की कमांडर तक बनीं.

मरियम कहती हैं कि उन्हें एक प्रकार के अधिकार का एहसास होता था, "लेकिन युद्ध में महिला होने का अपना ख़तरा होता है."

वह कहती हैं, "हम लोग पुरूषों से ज़्यादा असुरक्षित थे. लड़कों को तो सिर्फ़ टॉर्चर किया जाता था लेकिन महिलाओं का हमेशा बलात्कार होता था, टॉर्चर होता और फिर मार दिया जाता था. मुझे कभी यह पसंद नहीं था. इसलिय मैंने सोच रखा था कि गिरफ़्तार होने से पहले मैं अपने आप को ही मार लूंगी."

लड़ाई में

क्रांति लंबे समय तक चलने वाली थी. इरिट्रिया इस युद्ध से 1993 में ही अपनी आज़ादी के साथ निकल सका.

आज़ादी की लड़ाई में जीत की ख़ुशी का आनंद लेने के बाद मरियम उमर इरिट्रिया के नए अधिकारियों का शिकार हो गईं और उन्हें देश निकाला मिल गया.

वह ब्रिटेन चली गईं जहां वह पिछले साल तक एक इरिट्रियाई संगठन के साथ जुड़ी हुई थीं जो दुनिया भर में फैले इरिट्रिया बाशिंदों के नेटवर्क को सहयोग करता था.

अब वह स्वीडन में अपना कारोबार चलाती हैं. वह इरिट्रियन सरकार की कट्टर विरोधी हैं.

इस दौरान इरिट्रियाई फ़ौज में महिलाओं की भागीदारी जारी है.

यह दुनिया के उन गिने चुने देशों में शामिल है जहां महिलाओं के पुरूष के साथ युद्ध में खड़ा किया जाता है.

लेकिन मरियम उमर का कहना है कि महिलाओं की स्थिति निराशाजनक है.

वह कहती हैं, "उन्हें उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ रखा जाता है."

उन्होंने कहा, "अब कोई युद्ध लड़ने के लिए नहीं है, अब यह सिर्फ़ फ़ौजी नौकरी है जिसमें अधिकारियों की ज़रूरतों की सेवा होती है. वास्तव में वे ख़ुश नहीं हैं."

हो सकता है कि उनका यह मानना उनके स्वीडिश ज़िंदगी का नतीजा हो लेकिन उनका कहना है कि उन्होंने तस्वीर का बड़ा दूसरा भी देखा है.

उन्होंने कहा, "संघर्ष के अनुभव ने मुझे यह सिखाया है और परिपक्व बनाया है कि मैं बात-चीत और शांति में विश्वास करूं. सिर्फ़ बंदूक़ उठा कर लड़ने के लिए निकल पड़ना हमेशा किसी मसले का हल नहीं है."

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