दलाई लामा से मिले ओबामा, लेकिन...

Image caption बराक ओबामा ने दलाई लामा के साथ मुलाकात में बीच का रास्ता अपनाया है.

ऐसा हर बार नहीं होता है कि व्हाइट हाउस में चप्पल पहनकर राष्ट्रपति से मुलाकात करने कोई जाए और वो भी फरवरी महीने की ठिठुरती सर्दी में.

तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा कोई आम मेहमान नहीं हैं और अपनी चप्पलों की वजह से तो कतई नहीं. तुलनात्मक तौर पर सीमित राजनीतिक प्रभाव के बावजूद दलाई लामा की अमरीकी राष्ट्रपति से मुलाकात का असर वाशिंगटन से आगे भी हो रहा है.

इस घटनाक्रम से मानवाधिकारों के प्रति अमरीका की प्रतिबद्धता और इस मामले पर चीन से दो-दो हाथ करने की उसकी इच्छा भी जाहिर हो रही है.

व्हाइट हाउस में उनकी आवभगत कम-से-कम उतनी ही मायने रखती है जितनी कि बंद दरवाजों में उनकी चर्चा होती है. यह देखते हुए व्हाइट हाउस में उनकी यात्रा के खास इंतज़ाम किए गए थे.

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन चीन से मिलने वाली संभावित प्रतिक्रिया को लेकर इतने अधिक सावधान थे कि उन्होंने दलाई लामा के साथ कभी भी औपचारिक मुलाकात नहीं की. बजाए इसके वे अमरीका के बाकी अधिकारियों के साथ बैठक करवाकर दलाई लामा की यात्रा को सीमित कर देते थे.

चीन की समझदारी

हालांकि जॉर्ज डब्ल्यु बुश का झुकाव कहीं अधिक था. दलाईलामा से सार्वजनिक तौर पर मुलाकात करने वाले वे अमरीका के पहले राष्ट्रपति थे. इन दोनों के संबंध उस समय घनिष्ठता की सीमा तक पहुंच गए जब 2007 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने उन्हें अमरीकी संसद के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया. इस घटना ने चीन को गुस्से से भर दिया.

लेकिन इसके बावजूद बुश ने दलाई लामा के साथ बैठक के दौरान कभी भी टीवी कैमरों को आने की इजा़ज़त नहीं दी. यह कदम चीन के लिए आग में घी डालने जैसा था.

लगता है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इन दोनों ही तरीकों के बीच का रास्ता चुना है.

ओवल आफिस से परहेज करते हुए उन्होंने व्हाइट हाउस के मैप रूम में दलाईलामा से मुलाकात की. मुलाकात की एक फोटो भी जारी की गई लेकिन इस बार भी टीवी कैमरों की इज़ाज़त नहीं दी गई.

चीन ने इस मुलाकात की निंदा की लेकिन यह प्रतिक्रिया ऐसी मुलाकातों के बाद अक्सर होने वाली कूटनीतिक औपचारिकताओं का हिस्सा भर है.

किसी को भी उम्मीद नहीं है कि जानबूझकर आयोजित की गई दो अहम नेताओं की इस सामान्य मुलाकात का कोई असर अमरीका-चीन संबंधों पर पड़ेगा.

निश्चित तौर पर अहम नेताओं की इस मुलाकात को सामान्य रखते हुए राष्ट्रपति ओबामा ने मानवाधिकारों के अगुआ के तौर पर श्रेय लेने के जोखिम को कम किया है.

संघर्ष की सार्थकता

दबाव समूहों ने उस समय काफी नाराजगी दिखाई थी जब पिछले साल दलाई लामा वाशिंगटन आए और राष्ट्रपति ओबामा ने चीन की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के पहले उनसे नहीं मिलने का फैसला किया.

ओबामा के इस कदम का मतलब था-चीन की समझदारी की साफ तौर पर स्वीकृति. लेकिन उन लोगों ने इस कदम की निंदा की जिनका मानना था कि मानवाधिकारों का मामला अमरीका के एजेंडे से बाहर कर दिया गया है.

बैठक के बाद मैंने दलाई लामा से पूछा कि क्या वे इस बात से निराश नहीं हैं कि साल-दर-साल कूटनीतिक रिवाज का पालन किए जाने के बाद उसका असर इतना मामूली ही है.

उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘नहीं!’’ ‘‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उपलब्धि कितनी तेजी से हासिल होती है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर सफलता उनके जीवनकाल के बाद भी मिल जाती है तब भी उनका संघर्ष सार्थक माना जाएगा.’’

स्पष्ट है कि दलाईलामा समय के मामले में ज्यादातर लोगों से थोड़े अलग हैं.

1991 में जॉर्ज बुश से मुलाकात के दौरान दलाई लामा को सुरक्षा देने वाले अमरीकी अधिकारी डगलस पाल ने उनसे पूछा था कि क्या वे इसके पहले किसी अमरीकी राष्ट्रपति से मिले हैं.

दलाईलामा हंसे और बोले, ‘‘न तो मैं और न ही मेरे पहले के 13 लामाओं ने किसी राष्ट्रपति से मुलाकात की है.’’

अब कम-से-कम वे एक नियमित निमंत्रण की उम्मीद कर सकते हैं-कुछ शर्तों के साथ ही सही. भले ही उनका पहनावा कुछ भी हो.

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