आईटी छात्रों के लिए शिष्टाचार का स्कूल

Image caption बहुत से भारतीय छात्र छात्राओं में सम्पर्क कौशल का अभाव है

नौकरी पाने के लिए केवल डिग्री ही काफ़ी नहीं व्यवहार कुशलता और शिष्टाचार भी आना ज़रूरी है.

दक्षिण भारत के मैसूर शहर की एक कक्षा में युवक और युवतियां अपनी अध्यापिका छाया श्रीवास्तव की बातें पूरी एकाग्रता के साथ सुन रहे हैं.

छाया उन्हें बता रही हैं कि काम पर जाने के लिए किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए, किस तरह से अपने बॉस से बात करनी चाहिए और किस तरह व्यावसायिक ईमेल भेजते हुए चलताऊ बोली का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

इस कक्षा में बैठे सभी छात्र और छात्राएं यूं तो इंजीनियरिंग स्नातक हैं लेकिन उनमें सामाजिक कौशल का अभाव है. छाया श्रीवास्तव उन्हे कार्यस्थल के तौर तरीक़े सिखा रही हैं.

रमन इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंफ़ॉरमेशन टैक्नोलॉजी नामक इस संस्था की स्थापना दो साल पहले हुई थी.

सामाजिक कौशल का अभाव

छाया श्रीवास्तव संस्था में पढ़ने आए छात्रों के बारे में कहती हैं, "ये लोग सारा समय कंप्यूटर पर ख़र्च करते हैं. इनका जनसंपर्क भी तकनीकी नेटवर्क के ज़रिए होता है आमने सामने नहीं. जब ये किसी कार्यालय में काम करने जाते हैं तो नहीं जानते कि अपने साथियों से किस तरह पेश आएं, कैसे बातचीत करें. इनकी बॉडी लैंगुएज या शारीरिक हाव भाव सही नहीं होते और अफ़सोस की बात ये है कि कोई इन्हे ये कौशल नहीं सिखाता".

आजकल व्यापार जगत में देशों की सीमाएं लुप्त होती जा रही हैं. भारतीय कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को विदेशो में भी भेजती हैं. इसलिए ज़रूरी है कि ये लोग अन्य देशों की सभ्यता संस्कृति के प्रति सजग और सहिष्णु हों.

भारत की सूचना प्रौद्योगिकी कम्पनियों के संगठन नैसकॉम ने एक शोध किया जिसमें पाया कि भारतीय विश्वविद्यालयों से हर साल 30 लाख स्नातक निकलते हैं जिनमें से पांच लाख इंजीनियरिंग के स्नातक होते हैं. लेकिन इनमें से बहुत से ऐसे होते हैं जिन्हे नौकरी मिलना मुश्किल होता है.

नैसकॉम के भूतपूर्व अध्यक्ष किरण कार्निक कहते हैं, "इन छात्रों को इंजीनियरिंग की अच्छी जानकारी होती है उनका शैक्षिक आधार मज़बूत होता है लेकिन इनमें बातचीत का हुनर नहीं होता".

ये समस्या इसलिए भी है क्योंकि कुछ छात्र अपेक्षाकृत कम संभ्रांत और शिष्ट पृष्ठभूमि से आते हैं.

नौकरी के लायक नहीं

सूचना और प्रौद्योगिकी और बीपीओ उद्योग में इस समय 20 लाख से ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं और हर साल इसमें दसियों हज़ार नए लोग भर्ती होते हैं.

किरण कार्निक मानते हैं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली युवा पीढ़ी को नौकरी के लिए तैयार नहीं करती. उनका कहना है, "हमारी शिक्षा प्रणाली में रटने पर अधिक ज़ोर रहता है. छात्रों को सोचना और बोलना नहीं सिखाया जाता इसलिए वो स्नातक बनकर तो निकलते हैं लेकिन योग्य उम्मीदवार बनकर नहीं".

अगर आप किसी कंप्यूटर कम्पनी के दफ़्तर में काम कर रहे हैं तो आपको 10,000 मील दूर अमरीका में किसी ग्राहक से बात करनी पड़ सकती है. हो सकता है आपको किसी परियोजना या रिपोर्ट पर चर्चा करनी पड़े. इसलिए आपको बात करना और अपनी बात सामने रखना आना चाहिए.

Image caption रवितेज ने कई इंटरव्यू दिए लेकिन नौकरी नहीं मिली

रमन इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंफ़ॉर्मेशन टैक्नोलॉजी में जो छात्र इस तरह के कौशल सीख रहे हैं उनमें से बहुत से कर्नाटक के छोटे नगरों से आए हैं.

बेल्लारी नगर के रवितेज कहते हैं, "मैंने बंगलौर में कई नौकरियों के लिए इंटरव्यू दिए. पहले और दूसरे दौर के इंटरव्यू के बाद मुझसे कह दिया गया कि हम आपसे संपर्क करेंगे लेकिन किसी ने संपर्क नहीं किया".

बीजापुर की नयना को लगता है कि इस संस्था में पढ़ने से उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है. वो कहती हैं, "मैं थोड़ी शर्मीली हूं. मैं क्लास में खड़े होकर कभी सवाल नहीं पूछती थी लेकिन यहां मैंने सीखा है कि अपनी बात खुलकर कहना महत्वपूर्ण है".

बिदार की माया पाटिल को आशा है कि इस संस्था में पढ़ने के बाद उन्हे नौकरी मिलना आसान होगा. माया कहती हैं, "मैंने लोगों से बातचीत करना और व्यवहार करना सीखा है".

संस्था के एस वी वैंकटेश कहते हैं कि उनकी संस्था इन छात्रों को उद्योग जगत के लिए तैयार करने की कोशिश कर रही है.

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