बिगड़ी बनाने को तैयार महिलाएं

मंज़ूर अतीक़ा
Image caption बरतन न मांजने को लेकर मंज़ूर अतीक़ा पर फेंका गया तेज़ाब

चार साल की गुल ए महताब जानती है कि उसे बड़ा होकर क्या बनना है.

वो कहती है, “मां मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूंगी और तुम्हारा इलाज करूंगी जिससे तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी”.

गुल की मां मंज़ूर अतीक़ा पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर के बेनज़ीर भुट्टो अस्पताल में वार्ड नम्बर 10 में भर्ती हैं.

इस वार्ड में रंग बिरंगी शॉलें पहनें और भी कई महिलाएं भर्ती हैं जिनके एक तरह के घाव हैं और सब एक तरह के सदमे की शिकार हैं. सब पर तेज़ाब फेंक कर हमला किया गया था.

पाकिस्तान में इस बात के कोई राष्ट्रीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि कितनी महिलाएं इस तरह के हमलों का शिकार होती हैं लेकिन अभियानकर्ताओं का अनुमान है कि हर साल कोई 150 महिलाओं को ये हमले झेलने पड़ते हैं.

ये हमले आमतौर पर उनके पति या फिर ससुराल वालों के हाथों होते हैं.

बरतन मांजने पर विवाद

मंज़ूर अतीक़ा पर बरतन मांजने को लेकर हुई बहस की वजह से तेज़ाब फेंका गया.

वो कहती हैं, “सुबह के सात बजे थे. मैं नाश्ता बना कर निबटी थी. मेरी बेटी रो रही थी इसलिए मैंने उसे उठा लिया. मेरी सास ने कहा ‘उसे छोड़कर पहले बरतन मांज’. मैंने कहा अभी तो सारा दिन पड़ा है मैं बाद में मांज दूंगी. बस वो मुझे मारने पीटने लगे. मुझे चार पांच दिन तक होश नहीं आया. जब होश आया तो मैं लाहौर के अस्पताल में थी”.

अतीक़ा पर जो तेज़ाब फेंका गया उससे उनका निचला होंठ, गरदन और कंधे गल गए और अब उनकी ठोड़ी उनकी छाती से जुड़ गई है.

Image caption प्लास्टिक सर्जन चार्ल्स वीवा ने तेज़ाब से जली कई औरतों की शल्य चिकित्सा की है

लेकिन जब वो इस हमले की बात करती हैं तो उनमें कोई कड़वाहट नहीं है. वो कहती हैं कि उन्होने अपने ससुराल वालों को माफ़ कर दिया है.

वह कहती हैं, “वो मेरी मां और बहनों जैसी हैं. बस मैं अल्लाह से ये दुआ करती हूं कि उन्हे सही राह दिखाए और वो किसी और के साथ ऐसा न करें. मैंने उन्हे इसलिए माफ़ कर दिया जिससे उन्हे अपनी ग़लती का एहसास हो”.

मुफ़्त शल्य चिकित्सा

अतीक़ा मंज़ूर की छह बार शल्यचिकित्सा हो चुकी है. ब्रिटेन के प्लास्टिक सर्जन चार्ल्स वीवा के नेतृत्व में पाकिस्तानी और ब्रिटिश स्वयंसेवी निशुल्क ये काम करते हैं.

चार्ल्स वीवा कई दशकों से दुनिया भर के ग़रीबों की शल्य चिकित्सा कर रहे हैं जिनमें कई लोग तेज़ाब के शिकार भी हैं. वो चाहते हैं कि सरकारों को चाहिए कि न केवल तेज़ाब फेंकने वाले को बल्कि तेज़ाब सप्लाई करने वाले को भी सज़ा दी जाए.

जिंदगी ख़त्म नहीं हुई’

मंज़ूर के सामने वाले पलंग पर सायरा लियाक़त पडी़ हैं जिनका 18 वां ऑपरेशन हुआ है. उनकी फ़ाइल उनके पलंग पर लटकी हुई है जिसमें उनकी पुरानी फ़ोटो लगी हैं.

तेज़ाब ने उनके ख़ूबसूरती के सभी चिन्ह जला दिए हैं लेकिन उनकी हिम्मत को नहीं दबा पाया. हमले के बाद उन्होंने ब्यूटीशियन बनने का प्रशिक्षण लिया.

वो कहती हैं, “मैं चाहती हूं कि लोग कहें देखो उस लड़की ने कितना बर्दाश्त किया लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी. मैं अपने माता पिता और बेटे का सहारा बनना चाहती हूं. मैं उस आदमी को दिखा देना चाहती हूं कि उसके तेज़ाब फेंकने से मेरी ज़िंदगी ख़त्म नहीं हुई”.

Image caption सायरा को संभालती उनकी मां

सायरा के पति पर मुक़दमा चल रहा है. अगर वो दोषी पाया गया तो उसे पांच से 14 साल तक की जेल हो सकती है.

गुलशन ने उसे माफ़ नहीं किया है. वो कहती हैं, “उसे या तो मौत की सज़ा होनी चाहिए या उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंका जाना चाहिए जिससे उसे एहसास हो सके”.

अभियानकर्ता मांग कर रहे हैं कि ऐसे हमलों के लिए आजन्म कारावास का दंड दिया जाना चाहिए. एसिड सरवाइवर्स फ़ाउंडेशन की वेलरी ख़ान कहती हैं, “तेज़ाब से किए जाने वाले हमलों को पाकिस्तान की न्यायपालिका के सबसे ऊंचे स्तर पर बड़ी गंभीरता से लिया जा रहा है”.

न्याय की प्रतीक्षा

न्याय की प्रतीक्षा करने वालों में 23 वर्षीय नसीरा बीबी भी हैं.

उनके चेहरे पर तेज़ाब तब फेंका गया जब वो सो रही थीं. इससे उनकी नाक और दोनों आंखे जल गईं. वो मानती हैं कि ये हमला उनके पति ने किया.

लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता है कि चक्षुविहीन होकर वो अपने बच्चों को कैसे पालेंगी.

वो कहती हैं, “मुझे कम से कम 10 डॉक्टरों के पास ले जाया गया है लेकिन मेरी आंखों की रोशनी लौटने की कोई उम्मीद नहीं है”.

लेकिन एसिड सरवाइवर्स फ़ाउंडेशन ने उन्हे स्कूल पढ़ने भेजा और अब वो स्वेटर बुनना सीख गई हैं. उनके बच्चे भी उनके पास आ गए हैं.

उनके बस दो सपने हैं एक तो वो अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहती हैं और दूसरा यह कि अपने हमलावर को सज़ा मिलते देखना चाहती हैं.

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