एशियाई वोटों का प्रतिशत गिर सकता है

ब्रिटन की संसद
Image caption ब्रितानी आम चुनावों मे एशियाई मतदाताओं का प्रतिशत घटने के आसार

बीबीसी के एशियन नेटवर्क द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ 2010 के ब्रितानी आम चुनावों में आधे से कम ही एशियाई वोट पड़ने के आसार हैं.

इस सर्वेक्षण के मुताबिक़ छह मई को होने वाले चुनाव में एशियाई समुदाय से केवल 44 प्रतिशत लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे जबकि कुल ब्रितानी मतदाताओं में से 55 फीसदी ने कहा कि वे वोट डालेंगे.

मतदान के इच्छुक दक्षिण एशियाई मतदाताओं में भारतीय समुदाय के लोग सबसे ज़्यादा उत्साहित हैं, जो इस वर्ग का 51 प्रतिशत हैं, इनके बाद बांग्लादेशी मूल के लोग आते हैं 39 फीसदी पर, और पाकिस्तानी मूल के लोग 38 प्रतिशत पर आते हैं.

इस बार के चुनाव में पिछली बार की अपेक्षा ज़्यादा एशियाई उम्मीदवार खड़े हुए हैं, इनकी संख्या 89 है जबकि 2005 के चुनावों में 68 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे. लेकिन इसी सर्वेक्षण में ये भी पता चला है कि केवल 15 फीसदी एशियाई मतदाता एशियाई उम्मीदवार को वोट देंगे.

आईसीएम संस्था के इस सर्वेक्षण के मुताबिक एशियाई उम्मीदवार अपने समुदाय के लोगों में मतदान का उत्साह जगाने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं कर रहे हैं.

एक और तथ्य यह सामने आया है कि 10 एशियाई मतदाताओं में से चार ये मानते हैं कि कोई एशियाई कभी ब्रिटेन का प्रधानमंत्री नहीं बनेगा, लेकिन 21 फीसदी यह सोचते हैं कि आगामी 20 सालों में कोई एशियाई ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बन सकता है.

इसी सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि एशियाई समुदाय के 56 प्रतिशत लोग ये मानते हैं कि ब्रिटेन का नया प्रधानमंत्री आप्रवासन मामलों पर सख़्त रवैया अपनाएगा.

26 प्रतिशत लोगों की राय ये थी कि मतदान को धर्म प्रभावित करेगा लेकिन अधिकतर लोगों का कहना था कि वे मतदान धार्मिक आधार पर नहीं करेंगे.

एशियाई वोट को प्रभावित करने वाले संभावित मुद्दों के बारे में बताया गया है कि अर्थव्यवस्था 23 प्रतिशत, स्वास्थ्य सेवाएं 20 प्रतिशत और शिक्षा 16 प्रतिशत एशियाई मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है.

36 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वे छोटी पार्टियों को वोट दे सकते हैं.

एशियाई समुदाय के लोग तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से किस नेता को अपने घर पर करी की दावत देना चाहेंगे, इस दिलचस्प सवाल के जवाब में 35 प्रतिशत लोगों ने लेबर पार्टी के नेता गोर्डन ब्राउन का नाम लिया, 28 प्रतिशत ने कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता डेविड कैमरून का और 8 प्रतिशत ने लिबरल डैमोक्रैट पार्टी के निक क्लैग का नाम लिया.

आईसीएम संस्था ने भारत बंगलादेश और पाकिस्तानी समुदाय के 500 वयस्कों से बातचीत के आधार पर ये नतीजे पेश किए हैं.

उत्साह में कमी

एशियाई मतदाताओं मे इस बार उत्साह की कमी क्यों हैं इस बारे में ब्रैडफोर्ड के 19 वर्षीय छात्र परेश परमार का कहना था, “राजनीति में मुझे कभी दिलचस्पी नहीं रही, मैं मतदान की जगह टेलिविज़न देखना ज़्यादा पसंद करूंगा.”

वेस्ट यॉर्कशायर से 18 वर्षीय रिकी दुग्गल कहते हैं, “मैं शायद मतदान न करूं. राजनीति मुझे कभी आकर्षित नहीं करती वैसे भी मुझे नहीं लगता कि मेरे वोट से कुछ फ़र्क पड़ने वाला है.”

ब्रैडफोर्ड से ही ताहिर ख़ान कहते हैं कि उन्होंने कभी वोट नहीं दिया, “नेता निरर्थक बातें करते हैं. सब एक दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में लगे रहते हैं मुझे लगता है कि चुनावों में हमसे हमेशा ही झूठ बोला जाता है.”

लेकिन हमेशा से अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले ब्रैडफोर्ड के ही एक क्लब प्रोमोटर मनदीप सिंह इन बातों से सहमत नहीं, “यह बात मुझे हमेशा ग़ुस्सा दिलाती है कि हमारे वोट से फ़र्क नहीं पड़ेगा. कुछ लोग वोट डालना ही नहीं चाहते, उनकी अपनी मानसिकता है.”

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