जनगणना से घबरा रहे हैं दक्षिण एशियाई

अमरीकी जनगणना 2010
Image caption जनगणना में दक्षिण एशियाई लोग निजी जानकारी देने से डर रहे हैं.

अमरीका में आजकल जनगणना का काम ज़ोर शोर से चल रहा है. इस जनगणना में सभी से अपील की जा रही है कि सेंसस 2010 के फ़ार्म भर कर जनगणना विभाग को भेज दें.

लेकिन अमरीका में रहने वाले बहुत से दक्षिण एशियाई मूल के लोग जनगणना के फ़ार्म में निजी जानकारी देने से कतरा रहे हैं.

अमरीकी संविधान के तहत हर 10 साल पर देश में जनगणना कराई जाती है.

जनगणना 2010 के लिए अमरीका के सेंसस ब्यूरो ने देश भर के हरेक घर में एक फ़ार्म भेजा है जिसमें 10 सवाल हैं. इन 10 सवालों में परिवार के हर सदस्य और साथ में रहने वालों के नाम, पता और फ़ोन नंबर के अलावा उनलोगों की जन्मतिथि और नस्ल के बारे में भी पूछा गया है.

लेकिन बहुत से दक्षिण एशियाई मूल के लोग सेंसस फ़ॉर्म में निजी जानकारी देने से इसलिए डर रहे हैं, क्योंकि उनको डर है कि उस जानकारी का ग़लत प्रयोग हो सकता है और उनको निशाना भी बनाया जा सकता है.

अली नजमी न्यूयॉर्क में सेवा नाम की एक स्वयंसेवी संस्था के सह-निदेशक हैं और सेंसस के फ़ार्म भरने के लिए लोगों को प्रोत्साहित कर रहे हैं.

उनका कहना है, “बहुत से लोग सोचते हैं कि सरकार हमसे यह सवाल क्यों पूछ रही है, यह जानकारी लेकर क्या करेंगे, किसको देंगे. हमारे ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई तो नहीं की जाएगी.”

भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों से आकर अमरीका में रहने वाले बहुत से लोग कैलीफ़ोर्निया, न्यूयॉर्क, टैकसस और शिकागो जैसे इलाक़ों में रहते हैं.

मन का भय

Image caption लोगों को डर है कि सरकार जनगणना के बहाने कई जानकारियां ले रही है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अमरीका में क़रीब 27 लाख दक्षिण एशियाई मूल के लोग रहते हैं, और अंदाज़ा यह भी है कि लाखों की संख्या में लोग बिना सही कागज़ात के भी रह रहे हैं.

नेपाली मूल के तिलक श्रेष्ठ न्यूयॉर्क में सेंसेस स्वयंसेवक हैं. वह कहते हैं कि बहुत से लोगों में यह डर बना है कि सरकार सेंसेस के ज़रिए यह पता लगाना चाहती है कि देश में कितने लोग क़ानूनी तौर पर और कितने ग़ैर-क़ानूनी तौर पर रहते हैं.

तिलक श्रेष्ठ का कहना है,“सेंसस में जानकारी देने से बहुत से लोग इसलिए भी डर रहे हैं क्योंकि वह सोचते हैं कि सरकार का यह एक बहाना है यह पता लगाने का कि इस देश में कौन क़ानूनी तौर पर रहता है और कौन नहीं. इसलिए बहुत से लोगों ने सेंसस फ़ार्म कूड़ेदान में फेंक दिए हैं.”

इसी तरह मोहिबुल हक़ जो एक बंग्लादेशी अमरीकी हैं, वो कहते हैं कि बहुत से बंग्लादेशी मूल के लोग भी सोचते हैं कि उनको सेंसस का फ़ार्म भरने के बाद परेशानी हो सकती है.

जिन लोगों के पास अमरीका में रहने और काम करने के लिए सही कागज़ात नहीं हैं वह तो डरते ही हैं लेकिन कुछ ऐसे लोग भी जिनके पास ग्रीन कार्ड या अमरीकी नागरिकता है वह भी अपनी निजी जानकारी इस प्रकार सेंसस के फ़ॉर्म पर देने से कतरा रहे हैं.

मूल रूप से भारत के बनारस शहर की एक महिला सुषमा, न्यूयॉर्क में 30 साल से रह रही हैं. उन्होंने भी फ़ार्म भर कर नहीं भेजा है. वह कहती हैं, “आप देखिए हमें किस तरह एयरपोर्टों पर अलग करके पूछताछ की जाती है और निशाना बनाया जाता है. बहुत से लोगों को यह भी डर है कि हमारी निजी जानकारी असुरक्षित हो जाएगी. अगर हम सेंसस में सब साफ़ साफ़ लिख देंगे तो हमारे ख़िलाफ़ कार्रवाई का खतरा है.”

कुछ लोग जो अपने घरों में ग़ैरक़ानूनी ढंग से किराएदार रखे हैं वह भी डर रहे हैं कि सेंसस के फ़ार्म में सही जानकारी भरने से उन्हें मुश्किल हो सकती है. वहीं कुछ अमरीकी टैक्स विभाग के खौफ़ से भी यह फ़ार्म नहीं भर रहे हैं.

अमरीकी क़ानून के अनुसार जनगणना के इस फ़ार्म को सभी लोगों को भरकर वापस जनगणना विभाग को भेजना अनिवार्य है. इसके बावजूद बहुत से लोग इसकी अनदेखी कर रहे हैं.

कुछ लोग सेंसस के फ़ार्म को भरने में कोई फ़ायदा नहीं देखते हैं इसलिए जानकारी नहीं भर रहे हैं.

भारत के हैदराबाद शहर से आकर न्यूयॉर्क में बसने वाले जिगर हिमानी ने बताया कि वह खुद तो फ़ार्म भर कर भेजना चाहते हैं लेकिन कहते हैं,“लोग सोचते हैं कि इस फ़ार्म को भरने में उनका क्या फ़ायदा है और उसे कूड़े में फेंक देते हैं. तो कुछ लोगों को इसके मकसद के बारे में और जानकारी देना भी ज़रूरी है.”

अमरीका में पिछले दस सालों में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है. और इस समुदाय के लोगों की संख्या का सही अंदाज़ा लगाना सरकार और इस समुदाय के लोगों दोनों के लिए ज़रूरी हो गया है. क्योंकि विभिन्न समुदायों के लोगों की संख्या जानने के बाद उसी हिसाब से ही केंद्र सरकार हर वर्ष करीब 40 अरब डॉलर की आर्थिक मदद का आवंटन करती है.

मकसद

Image caption कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं लोगों को इस मामले में मदद कर रही है.

अगर जनगणना में किसी समुदाय के लोगों की सही संख्या से कम को रिकार्ड में दर्ज किया जाएगा तो उस समुदाए के लोगों के रिहाईशी इलाकों में सरकारी मदद कम पहुंचेगी क्योंकि आंकड़े लोगों की कम संख्या दर्शा रहे हैं.

इसके अलावा जनगणना से यह भी तय किया जाएगा कि राज्यों की विधानसभा के लिए किस क्षेत्र में कितने प्रतिनिधि होने चाहिए.

यही कारण है कि शहर में स्थित कई दक्षिण एशियाई मूल की स्वयंसेवी संस्थाएं जैसे छाया, सेवा और अधिकार इस बार जनगणना में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी की कोशिश कर रही हैं.

स्वयंसेवी संस्थाएं लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही हैं कि अमरीकी क़ानून के तहत सेंसस के फ़ार्म में दी गई जानकारी का अमरीकी सरकार जनगणना के अलावा किसी भी कार्रवाई के लिए प्रयोग नहीं कर सकती.

लेकिन लोगों में व्याप्त डर कम करने में यह संस्थाएं ज़्यादा कामयाब नहीं हो पा रही हैं.

दक्षिण एशियाई मूल की स्वयंसेवी संस्था छाया की निदेशक सीमा अगनानी कहती हैं, “बहुत से लोगों को सरकार पर विश्वास नहीं है. क्योंकि 11 सितंबर के बाद हमारे समुदाए के बहुत से लोगों को निशाना बनाया गया, गिरफ़्तार किया गया, देश से बाहर कर दिया गया. इसलिए लोग तो डरे हुए हैं, लेकिन यह सेंसस बिल्कुल अलग है इसमें दी गई जानकारी किसी और विभाग को नहीं दी जाएगी. अगर हमारे लोग इसमें भाग नहीं लेंगे तो यह उन्हीं का नुकसान होगा.”

लोगों को जनगणना के फ़ायदे भी समझाए जा रहे हैं. उनको बताया जा रहा है कि जनगणना के आधार पर ही केंद्र सरकार विभिन्न इलाक़ों में सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराएगी.

लोगों से आग्रह

इस मामले में सेंसस ब्यूरो भी ये सोचकर इन संस्थाओं की में मदद ले रहा है कि समुदाए के लोगों को यह समझाया जाए कि सेंसस उनके भले के लिए है.

सेंसस में भाग लेने के लिए दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को प्रोत्साहित करने के मकसद से विभिन्न भाषाओं जैसे हिंदी, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, बंगाली और नेपाली में कई विज्ञापनों को समाचार पत्रों में छापा गया है, और टीवी औऱ रेडियो पर प्रसारित भी किया जा रहा है.

सेंसस ब्यूरो ने फ़ार्म के नमूने भी कई दक्षिण एशियाई भाषाओं में छपवाए हैं.

इनमें कैरिबियाई देशों के भारतीय मूल के लोगों को भी शामिल किया गया है.

इसी मुहिम के तहत सेवा नामक संस्था ने सेंसस के लिए प्रोत्साहन बढ़ाने के मकसद से शहर में होने वाले क्रिकेट मैचों के दौरान भी कोई 15 टीमों के दक्षिण एशियाई मूल के खिलाड़ियों को बल्ले और अन्य सामान बांटे हैं जिनपर सेंसस में भाग लेने के संदेश दर्ज हैं.

लेकिन कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं यह भी शिकायत कर रही हैं कि सेंसस ब्यूरो ने दक्षिण एशियाई लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए यह मुहिम बहुत देर से शुरू की और ठीक तरह से दक्षिण एशियाई स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रयोग नहीं किया गया.

इन सारी कोशिशो के बावजूद अभी तक न्यूयॉर्क के क्वींस इलाके, जहां दक्षिण एशियाई मूल के लोग भारी संख्या में रहते हैं, क़रीब 45 प्रतिशत ही लोगों ने सेंसस के फ़ार्म भरकर भेजे हैं.

लेकिन एक मई के बाद सेंसस ब्यूरो के कर्मचारी लाखों की संख्या में देश भर में घर-घर जाकर लोगों के बारे में जानकारियां इकट्ठा करेंगे.

और दिसंबर महीने में जनगणना पूरी करके सेंसस 2010 राष्ट्रपति बराक ओबामा को पेश कर दिया जाएगा.

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