ब्रिटेन चुनाव में एशियाई महिलाएँ

शबाना महमूद
Image caption शबाना महमूद लेबर पार्टी की एक सुरक्षित सीट से उम्मीदवार हैं

ब्रिटेन में एशियाई मूल की महिलाएँ आज तक संसद के निचले सदन में पहुँचने में नाकाम रही हैं – मगर इस बार के चुनाव में ये इतिहास बदलना तय लग रहा है.

इस बार के चुनाव में तीनों मुख्य राजनीतिक पार्टियों – लेबर, कंज़र्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेट्स – ने एशियाई मूल की 22 महिलाओं को चुनाव में उतारा है जो एक रेकॉर्ड है.

मगर इस बदलाव में अच्छा-ख़ासा समय लगा है, ख़ास तौर पर पुरूष एशियाई सांसदों के प्रदर्शन को देखते हुए.

ब्रिटेन की संसद में चुनकर जानेवाले सबसे पहले एशियाई सांसद थे दादाभाई नौरोजी जिन्होंने 1892 में लंदन की फ़िन्सबरी सीट पर लिबरल पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था.

उसके बाद से अब तक नौ एशियाई लोग सांसद बन चुके हैं लेकिन इनमें महिला एक भी नहीं है.

शुरूआत

ब्रिटेन के मुख्य विपक्षी दल कंज़र्वेटिव पार्टी ने नवंबर 2006 में एसेक्स काउंटी की विटहैम सीट से प्रीति पटेल को चुनाव में उतारा था.

प्रीति कहती हैं,"जब डेविड कैमरोन पार्टी के नेता बने तो उनका इरादा बिल्कुल साफ़ था कि वे अपनी पार्टी को आधुनिक ब्रिटेन की तरह बनाना चाहते हैं.

"राजनीति में मेरी दिलचस्पी बिल्कुल निचले स्तर से ही रही थी. मैं पार्टी के लिए 18 साल की उम्र से ही चुनाव प्रचार कर रही हूँ.

Image caption प्रीति पटेल दूसरी बार कंज़र्वेटिव पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं

"राजनीति से मेरा जुड़ाव कुछ हद तक मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण हुआ. मेरे माता-पिता इस देश में पूर्वी अफ़्रीका से आए थे जब इदी अमीन ने उनको ख़ाली हाथ वहाँ से भगा दिया.

"उन्होंने सफलता के लिए बहुत-बहुत संघर्ष किया. मुझे लगता है कि सफलता के लिए मिला ये स्वतंत्र माहौल और साथ में उपलब्ध पारंपरिक मूल्यों और स्वस्थ राजनीति वाले वातावरण को देखकर हम स्वतः कंज़र्वेटिव पार्टी से आकर्षित होते चले गए."

दक्षिण-पश्चिमी लंदन की विंबलडन सीट से लिबरल डेमोक्रेट्स पार्टी की उम्मीदवार शास शीहान कहती हैं,"मेरे साथ कोई अचानक ऐसा नहीं हुआ कि बस कहीं से कोई आवाज़ आई कि हाँ मुझे अब तो केवल राजनीति ही करनी है."

"कुछ मुद्दे थे जिनपर मेरा ध्यान था और मुझे लगातार निराशा होती गई जब मैंने देखा कि राजनीति में उनके बारे में कुछ भी नहीं हो रहा है."

वकील रह चुकीं शबाना महमूद बर्मिंघम लेडीवुड सीट से लेबर पार्टी की उम्मीदवार हैं जो लेबर पार्टी की बड़ी नेता और मंत्री रह चुकीं क्लेयर शॉर्ट की सीट है.

ये सीट इराक़ युद्ध को लेकर क्लेयर शॉर्ट के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर से मतभेद के कारण पार्टी छोड़ने से ख़ाली हुई है.

शबाना महमूद कहती हैं,"मैं लेडीवुड सीट का प्रतिनिधित्व करती हुई स्वयं को सम्मानित महसूस कर रही हूँ. मुझे लगता है कि इस बार एक महत्वपूर्ण बाधा दूर हो जाएगी और ये सिद्ध कर पाना कि इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं, किस नस्ल के हैं, किस धर्म के हैं, ये महत्वपूर्ण है.

"संसद को सबके लिए खुला होना चाहिए और इसे वास्तव में उनलोगों की तरह दिखना चाहिए जिनकी ये प्रतिनिधित्व करती है."

मुश्किलें

मगर प्रश्न उठता है कि राजनीति में ब्रिटिश एशियाई महिलाओं की स्थिति में बदलाव आने में इतनी देर क्यों हुई

यॉर्क विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र और महिला अध्ययन विभाग में प्राध्यापक बैरोनेस हालेह अफ़शर संसद के ऊपरी सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में पहुँचनेवाली पहली ईरानी महिला हैं.

बैरोनेस अफ़शर कहती हैं,"एशियाई महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है क्योंकि लोगो के मन में उनकी एक छवि बैठी हुई है. मुस्लिम महिलाओं के साथ भी इसी छवि की समस्या है. मगर बाधाओं से पार पाना होता ही है.

"एशियाई महिलाएँ अब ऐसी स्थिति में हैं जब वे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने का अधिकार माँग रही हैं. जैसे ही पार्टियाँ उनपर ध्यान देंगीं, हालत बेहतर होगी."

महत्वाकांक्षा

Image caption शास शीहान विंबलडन से लिबरल डेमोक्रेट्स पार्टी की उम्मीदवार हैं

चुनाव में कुछ समूह बराबरी की माँग के साथ कुछ ऐसी माँगें भी कर रहे हैं जिनपर विवाद है.

ऑपरेशन ब्लैक वोट नामक एक संस्था की कार्यकर्ता कैरेन चौहान कहती हैं,"काले-एशियाई अल्पसंख्यकों के लिए संसद में 35 सीटें होनी चाहिए और चूँकि महिलाएँ आबादी मं आधी हैं इसलिए इन सीटों में भी महिलाओं को आधा हिस्सा दिया जाना चाहिए."

मगर राजनेता इस माँग से सहमत नहीं हैं.

प्रीति पटेल कहती हैं,"सकारात्मक क़दम तो लिए जा ही रहे हैं. लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, प्रशिक्षित किया जा रहा है, सहयोग दिया जा रहा है. स्थानीय संस्थाओं और पार्टियों में पहले से ही काफ़ी महिलाएँ आगे आकर काम कर रही हैं. एक ही दिन में सबकुछ नहीं बदल सकता."

शबाना महमूद कहती हैं,"लेबर पार्टी ने चार एशियाई महिलाओं को ऐसी सीटों पर उतारा है जो बिल्कुल सुरक्षित हैं. यानि ये लगभग तय है कि ये चारों महिलाएँ सांसद बनने जा रही हैं."

मगर क्या राजनीति में एशियाई महिलाओं की भागीदारी सीमित होने का और भी कोई कारण है?

शास शीहान कहती हैं,"संस्कृति तो एक रूकावट है ही. जब मैं पहली बार पार्टी उम्मीदवार चुनी गई तो कई लोगों ने कहा कि एशियाई और मुस्लिम पुरूष मुझसे बात नहीं करेंगे. मगर मैंने पाया कि ऐसा नहीं था."

तो ब्रिटिश संसद में एक पुरूष एशियाई सांसद के पाँव रखने के 118 वर्ष बाद अब लग रहा है कि संसद के दरवाज़े एशियाई महिलाओं का स्वागत करने के लिए भी खुलनेवाले हैं.

संबंधित समाचार