रडार को भी चकमा देगा शिवालिक

आईएनएस शिवालिक
Image caption जिन देशों के पास ऐसी क्षमता है वो हैं अमरीका, ब्रिटेन, रूस, चीन, जापान और इटली.

भारतीय नौसेना को आईएनएस शिवालिक की कमान सौंप दी गई है. देश में ही निर्मित ये ऐसा पहला युद्धपोत है जो रडार से बच निकलने में सक्षम है.

इस तरह भारत उन चुने हुए देशों में शामिल हो गया है जिसके पास ऐसी क्षमता है.

इसे मुंबई स्थित मंझगाँव डॉक्स ने तैयार किया है और ये प्रोजेक्ट 17 फ़्रिगेट के तीन युद्धपोतों में से एक है.

ये युद्धपोत 143 मीटर लंबा है और इसका वज़न करीब 6,000 टन है.

जिन देशों के पास ऐसी क्षमता है वो हैं अमरीका, ब्रिटेन, रूस, चीन, जापान और इटली.

अनावरण

नए युद्धपोत का अनावरण करते हुए रक्षा मंत्री एके ऐंटनी ने कहा, “हम अपने आपको को शक्तिशाली ताकत कह सकते हैं और नौसेना को हमेशा चौकन्ना रहना चाहिए क्योंकि भारतीय तटरेखा बेहद लंबी है.”

उन्होंने कहा कि नौसेना का हमेशा उच्च दर्जे की तैयारी करके रखनी चाहिए और एक पेशेवर नौसेना ही चुनौतियों का सामना कर सकती है.

शिवालिक युद्दपोत विभिन्न परिस्थितियों में खतरों से निपटने में सक्षम है.

शिवालिक श्रेणी के दूसरे युद्धपोत हैं आईएनएस सयहद्री और आईएनएस सतपुरा.

आईएनएस सयहद्री के नवंबर तक नौसेना में शामिल होने की संभावना है, जबकि आईएनएस सतपुरा के लिए अगले वर्ष के मध्य तक का लक्ष्य रखा गया है.

नौसेना में युद्धपोत डिज़ाइन के डायरेक्टर जनरल रियर ऐडमिरल केएन वैद्यनाथन के मुताबिक आईएनएस शिवालिक में ऐसी विशेषताएँ हैं जिससे दुश्मन सेनाओं को चकमा दिया जा सके.

उन्होंने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि वर्ष 1954 से डॉयरेक्टोरेट ऑफ़ नेवेल डिज़ाइन ने तरह-तरह के 17 युद्धपोत डिज़ाइन तैयार किए हैं और 80 युद्धपोत बनाए हैं.

उन्होंने कहा कि चार डिज़ाइनों के 11 युद्धपोत बनाए जा रहे हैं.

केएन वैद्यनाथन ने कहा कि हालांकि शिवालिक प्रोजेक्ट को तैयार करने में नौसेना को 12 सालों का समय लग गया, ये कोई नई बात नहीं क्योंकि दुनिया भर में इतना ही वक्त लगता है.

रक्षा विशेषज्ञ उदय भास्कर का कहना है, “आईएनएस शिवालिक पाकिस्तान और चीन किसी के ख़िलाफ़ नहीं है. इस क्षमता के साथ भारत इन देशों के साथ जिस तरह का रिश्ता बनाना चाहता है, उस पर सकारात्मक प्रभाव होगा.”

समस्याएँ

हालांकि हर जगह शिवालिक की तारीफ़ हो रही है, उदय भास्कर के मुताबिक जितना वक्त और पैसा इस युद्दपोत को बनाने में लगा है, इससे कई सवाल उठे हैं.

उदय भास्कर कहते हैं, “शिवालिक की शुरूआत 1999 में हुई थी. 11 साल के बाद ये कमीशन हो रहा है. जिस तरह इसे बनाने में उम्मीद से ज़्यादा पैसा और वक्त लगा, उसकी समीक्षा होनी चाहिए.”

उनका मानना है कि देरी की वजह है जवाबदेही का नहीं होना.

उदय भास्कर कहते हैं, “वर्ष 2003 में शिवालिक को पानी में उतारा गया था. इस घटना को सात साल बीत गए हैं. अगर आप जापान और दक्षिण कोरिया से इसकी तुलना करें तो भारत में खर्च किया गया समय और पैसा दो या तीन गुना ज़्यादा है.”

आईएनएस शिवालिक भारत में बने हथियारों से तो लैस है ही, इसमें बराक मिसाइल और श्टिल डिफ़ेंस सिस्टम जैसे विदेश से आयात किए गए हथियार भी लगे हुए हैं.

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