लीजिए ऑर्गैनिक चाय की चुस्की

  • 2 मई 2010
ऑर्गैनिक फ़ार्मिंग
Image caption कुछ चाय बागान मालिक रसायन खाद का इस्तेमाल नहीं करते.

अगर आप असम के गोसाँईबारी स्थित चाय के बागान जाएँ तो आपका स्वागत गाय के गोबर के बड़े से ढेर, सड़ते हुए फूल, मछली और मीट के बचे-खुचे टुकड़ों से होगा.

लेकिन आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं. दरअसल चाय का ये बागान ऑर्गैनिक खेती कर रहा है.

गोसाँईबारी के मालिक बिनोद सहरिया कहते हैं कि वो अपने बागानों में रसायन खाद का इस्तेमाल नहीं करते.

इसके लिए उन्होंने पूर्व मैनेजमेंट सलाहकार स्वामी वाल्मीकि आयंगर की मदद ली है.

वाल्मीकि आयंगर कहते हैं कि उन्होंने वृक्ष आयुर्वेद का अध्ययन किया है जो परंपरागत दवाइयों की पद्यति है.

उनका कहना है कि उन्होंने ऑर्गैनिक खेती के सिद्धांत को विकसित किया है जो लंबे समय तक कायम रहेगा.

वाल्मिकी आयंगर करते हैं, “जिस तरह परंपरागत भारतीय औषधियों में पारे का इस्तेमाल होता है, उसी तरह प्रदूषण फ़ैलाने वाले पदार्थों में दूसरी चीज़ों को मिलाने से सबसे अच्छी किस्म की खाद बनती है.”

बिनोद सहरिया और स्वामी वाल्मीकि आयंगर को विश्वास है कि वो भारत, खासकर असम के ग्रामीण इलाकों को कीटनाशकों, कीड़ों को भगाने वाली दवाईयों और रासायनिक खाद की वजह से हो रहे प्रदूषण से मुक्ति दिला पाएँगे.

मदद

माना जा रहा है कि ऑर्गैनिक खाद के इस्तेमाल से भारतीय चाय के दाम में वृद्धि होगी और उसके लिए नए बाज़ार खुलेंगे.

बिनोद सहरिया ने जब गोसाँयबारी की कमान अपने हाथों में ली, तो 140 साल पूराने इस चाय बागान को अपनी दशा बदलने का इंतज़ार था.

यहाँ का वार्षिक उत्पादन अपने अधिकतम 900,000 किलोग्राम प्रतिर्ष से घटकर 355,000 किलोग्राम रह गया था.

एक साल बाद स्थिति बेहतर दिख रही है. बागान का वार्षिक उत्पादन बढ़कर 600,000 किलोग्राम हो गया है.

बिनोद सहरिया चाहते हैं कि दूसरे चाय बागान मालिक उनकी तकनीक इस्तेमाल करें.

वो कहते हैं, “हमारे पास व्यापार से जु़ड़ा कोई रहस्य नहीं है. हम चाहते हैं कि भारतीय चाय उद्योग ऑर्गैनिक खेती करे.”

‘अनूठा अनुभव’

Image caption रसायन खाद के इस्तेमाल से भारतीय चाय को यूरोप में बेचने से मना कर दिया गया है

इंदरजीत सिंह ओबेरॉय पहले सेना में थे. उन्होंने गोसाँयबारी से कई बड़े बागानों के लिए काम किया है, लेकिन उन्होंने अनुभव हासिल करने के लिए गोसाँयबारी में भी काम किया.

वो कहते हैं, “ये सोच बहुत अनूठी है और मैं इसका हिस्सा होना चाहता हूँ. ऐसा करने से भारतीय चाय उद्योग को बचाया जा सकता है और इससे खरीदारों को ढूँढने में मदद मिलेगी.”

भारतीय चाय उद्योग बढ़ते उत्पादन खर्चों और गिरते दामों से परेशान है.

रसायन खाद के बेतहाशा इस्तेमाल और मिलावट की वजह से भारतीय चाय को यूरोप में बेचने से मना कर दिया गया है.

दरअसल यूरोप में लोग अपनी सेहत को लेकर बहुत सतर्क हैं.

वर्ष 2009 में भारत में करीब 98.1 करोड़ किलोग्राम चाय का उत्पादन हुआ.

ये दुनिया के चाय उत्पादन का करीब एक-चौथाई है.

करीब 20 करोड़ किलोग्राम चाय का निर्यात किया गया.

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