टैगोर जयंती के रंग में रंगा बंगाल

शांतिनिकेतन
Image caption शांतिनिकेतन ने भी टैगोर की 150वीं जयंती को अपने तरीके से मनाने का फ़ैसला किया है.

रबिंद्र संगीत तो पहले से ही बंगाल की पहचान है. अब इसके रचयिता और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कविगुरू रवींद्र नाथ टैगोर की डेढ़-सौवीं जयंती के मौके पर पूरा पश्चिम बंगाल ही उनके रंग में रंग गया है.

रविवार नौ मई को कविवर की डेढ़ सौवीं जयंती के मौके पर पूरे साल कोलकाता से शांतिनिकेतन तक अलग-अलग समारोहों के आयोजन की तैयारियां की गई हैं.

राज्य की वाममोर्चा सरकार के अलावा रेल मंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मौके को अलग-अलग तरीके से मनाने की तैयारी की है.

राज्य सरकार ने जहाँ कोलकाता में कविगुरू के जन्मस्थान जोड़सांको के पुनर्निर्माण की योजना बनाई है, वहीं रेलवे ने इस मौके पर हावड़ा और बोलपुर में रबिंद्र संग्रहालय स्थापित करने का फैसला किया है.

ममता बनर्जी रविवार को यहाँ हावड़ा स्टेशन पर ‘संस्कृति एक्सप्रेस’ को झंडी दिखा कर रवाना करेंगी.

यह ट्रेन टैगोर की कृतियों का चलता-फिरता संग्रहालय होगी. एक साल तक देश के विभिन्न हिस्सों में घूमने के बाद यह कोलकाता लौट आएगी.

साल भर का आयोजन

मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा, “साल भर तक चलने वाले इस आयोजन के दौरान टैगोर के चित्रों का एक संग्रह के प्रकाशन की योजना है. कविगुरू के आदर्श मौजूदा दौर में भी प्रासंगिक हैं.”

सरकार ने इस आयोजन के लिए समाज के विभिन्न तबकों के लोगों को लेकर एक समिति का गठन किया है.

भट्टाचार्य ने कहा, “हम बांग्लादेश के साथ भी बातचीत कर रहे हैं ताकि कविगुरू के जयंती समारोह का साझा आयोजन किया जा सके.”

Image caption टैगोर के जन्मस्थान जोड़सांको के पुननिर्माण की योजना बनाई गई है

सरकार ने कविगुरू के जन्मस्थान जोड़ासांको के अलावा नीमतला घाट की मरम्मत कर उसे नया रूप देने का फैसला किया है. नीमतला में ही टैगोर का अंतिम संस्कार हुआ था.

दूसरी ओर, रेल प्रशासन ने इस मौके पर हावड़ा और बोलपुर (शांतिनिकेतन) में संग्रहालय स्थापित करने का फैसला किया है. हावड़ा स्टेशन के ठीक सामने बनने वाले रबिंद्र रेल संग्रहालय पर 16 करोड़ और बोलपुर में प्रस्तावित गीतांजलि संग्रहालय पर साढ़े आठ करोड़ रुपए खर्च होंगे.

शांतिनिकेतन में स्थापित विश्वभारती विश्वविद्यालय ने भी इस मौके को अपने तरीके से मनाने का फैसला किया है.

उसने केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता से कविगुरू के चित्रों का एक संग्रह प्रकाशित करने की योजना बनाई है. यह चार खंडों में होगा.

केंद्र ने इस रबिंद्र चित्रावली के पहले खंड के प्रकाशन के लिए आवंटित रकम भेज दी है. विश्वभारती ने टैगोर की तमाम रचनाओं की एक सिरीज़ 'रबिंद्र रचनावली' शीर्षक से प्रकाशित करने का भी प्रस्ताव रखा है.

इसके अलावा विश्वविद्यालय परिसर में एक हज़ार सीटों वाले एक आडिटोरियम के निर्माण का प्रस्ताव भी केंद्र के अनुमोदन के लिए भेजा गया है.

रेलवे के अधिकारी बताते हैं कि पांच डब्बों वाली संस्कृति एक्सप्रेस के हर डब्बे में कविगुरू के जीवन के अलग-अलग पहलुओं की झलक होगी.

एक साल की यात्रा के दौरान यह ट्रेन लगभग 70 स्टेशनों पर ठहरेगी. इसे बांग्लादेश की राजधानी ढाका भेजने की भी योजना है. इस ट्रेन का मकसद युवा पीढ़ी को टैगोर की विरासत से अवगत कराना है.

जब हर स्तर पर कविगुरू की जयंती को बड़े पैमाने पर मनाने की तैयरियां चल रही हों तो भला उनका स्कूल कैसे पीछे रह सकता है.

स्कूल की योजना

Image caption कोलकाता में कविगुरू के गीतों के संग्रह का लोकार्पण का सिलसिला भी शुरू हो गया है.

कोलकाता के सेंट जेवियर्स स्कूल और कालेज ने भी पूरे साल विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन की योजना बनाई है. इसकी शुरूआत टैगोर की कविताओं के पाठ से होगी.

संयोग यह है कि इसी साल इस स्कूल की स्थापना के भी 150 साल पूरे हो रहे हैं.

टैगोर ने दो साल तक स्कूल की पढ़ाई यहीं की थी.

टैगोर को 14 साल की उम्र में वर्ष 1875 में इस स्कूल में पांचवीं कक्षा में दाखिल कराया गया था. यह उनका चौथा और आखिरी स्कूल था. इसके बाद उनके पिता ने घर पर ही उनकी पढ़ाई की व्यवस्था की थी.

कविगुरू को स्कूली शिक्षा शुरू से ही पसंद नहीं थी. कोलकाता में कविगुरू के गीतों के संग्रह का लोकार्पण का सिलसिला भी शुरू हो गया है.

जाने-माने फिल्मकार ऋतुपर्णो घोष ने रवींद्र नाथ की कहानी पर आधारित फिल्म ‘नौकाडुबी’ बनाई है. कविगुरू ने यह कहानी वर्ष 1912 में लिखी थी. लेकिन मौजूदा दौर में भी यह प्रासंगिक है. यह फिल्म जल्दी ही रिलीज़ होगी.

घोष कहते हैं कि, “आधुनिकता के दबाव में नई पीढ़ी टैगोर के आदर्शों को भुला रही है. लेकिन टैगोर आज भी प्रासंगिक हैं. उनके आदर्शों को जीवन में ढालना ही डेढ़-सौवीं जयंती के मौके पर कविगुरू को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.”

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