अफ़्रीका डायरी

अफ़्रीक़ा की धरती का रंग गेरुआ लाल है और इस पर गहरे हरे रंग की चादर चढ़ी रहती है.

धरती का लाल रंग सिर्फ़ पगडंडियों, कच्ची सड़कों या फ़सल के लिए तैयार किए जा रहे खेतों में ही उजागर होता है.

और जिस जगह ये रंग उजागर होता है वहाँ ऐसा लगता है कि किसी चित्रकार ने चमत्कृत करने के लिए हरे कैनवास पर लाल रंग से एक रेखा खींच दी हो.

ताज़ा हरी घास, हरी झाड़ियाँ, केले, नारियल, कोको, नीबू के फलों से लदे हरे पेड़, खेतों पर फैली हरी फ़सलें और गहरे हरे रंग के घने जंगल.

अफ़्रीक़ा से पहले इतनी हरितिमा मैंने सिर्फ़ झारखंड और उड़ीसा के आदिवासी इलाक़ों में देखी थी.

झारखंड में दुमका से आगे आदिवासी गाँवों की ओर जाने वाली सड़कों पर 10-12 साल पहले गया था, वहाँ उन दिनों चर्च पर हमले किए जा रहे थे.

फिर उड़ीसा के कालाहांडी-बोलांगीर ज़िलों में गया जहाँ कई लोग भूख मिटाने के लिए ज़हरीली गुठलियों का आटा खाकर मर गए थे.

झारखंड और उड़ीसा के इन इलाक़ों में हरे भरे लैंडस्केप को पहली बार देखने वाला यक़ीन नहीं कर सकता कि वहाँ की धरती पर रहने वालों के लिए जीवन कितना दारुण बना दिया गया है.

और अब मैं पश्चिमी अफ़्रीक़ा के आइवरी कोस्ट मुल्क में इन विरोधाभासी रंगों को देख रहा हूँ.

इस मुल्क के सबसे बड़े शहर अबिदजान से गिन्युआ तक लगभग 300 किलोमीटर का सफ़र के दौरान सड़क के किनारे ठीक झारखंड और उड़ीसा जैसे हाट बाज़ार दिखाई देते हैं.

लोग सड़कों के किनारे अपने खेतों में उगाए फल और सब्ज़ियाँ तरतीबवार सजाए रहते हैं: बड़े बड़े सैकड़ों केले, नीबू, कंदमूल, टमाटर, अवाकाडो के साथ साथ चावल और दूसरा अनाज भी.

विश्वकप का इंतज़ार

यहाँ की धरती रत्नगर्भा है. लेकिन गाँवों में फूले पेट वाले बच्चे दिखाई पड़ते हैं– कुपोषण और बीमारियों से शिकार.

Image caption सभी अफ़्रीकियों को विश्व कप फ़ुटबॉल का इंतज़ार है

पर इन्हीं बच्चों में से दिदिए द्रोग्बा जैसे एकलव्य भी निकलते हैं.

वो फ़ुटबॉल से हर हफ़्ते डेढ़ लाख पाउंड या क़रीब सवा करोड़ रुपए कमाते हैं.

द्रोग्बा अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल का ऐसा सितारा है जिससे आइवरी कोस्ट के लोगों को उम्मीद है कि वो चाहे तो देश के अंतरकलह को ख़त्म कर सकता है.

आइवरी कोस्ट में एक छोर से दूसरे छोर तक चले जाइए, चारों ओर एक शांति पसरी मिलती है.

लेकिन इस शांति के पीछे बरसों से अंगारों की तरह धीरे धीरे सुलग रही अशांति मौजूद है– फ़ौजी तख़्ता पलट, जातीय और क़बाइली लड़ाइयाँ, आपस में ख़ूनी जंगें और आगज़नी.

पिछले छह साल से यहाँ चुनाव करवाने की कोशिशें हो रही हैं लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है. किसी तरह गठबंधन सरकार की गाड़ी चल रही है.

बहुत लोग कहते हैं कि दिदिए द्रोग्बा ने 2006 में आइवरी कोस्ट की टीम की ओर से शांति की अपील जारी की थी जिसके बाद सरकार में स्थिरता आई है. द्रोग्बा का ऐसा असर है.

और अब सभी अफ़्रीक़ियों को दक्षिण अफ़्रीक़ा में होने जा रही विश्वकप फ़ुटबाल प्रतियोगिता का इंतज़ार है.

अफ़्रीक़ा की छह टीमें इस बार विश्वकप के लिए जीती हैं. गाँव-गाँव और शहर-शहर में लोग अपनी अपनी टीमों के लिए जी जान से समर्थन में जुटे हुए हैं.

हालाँकि उन्हें मालूम है कि जीत का कोई चांस नहीं है. पर यही वह विरोधाभास तो अफ़्रीका को अफ़्रीक़ा बनता है.

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