ईस्ट इंडिया कंपनी पर भारतीय का राज--बीबीसी विशेष

पंद्रह अगस्त को जहाँ भारतवासी स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे होंगे वहीं बाज़ार में उतर रही लंदन की एक कंपनी भी 15 अगस्त को जश्न मनाने की तैयारियाँ कर रही हैं.

ये कोई मामूली कंपनी नहीं है- 15 अगस्त को ऐतिहासिक ईस्ट इंडिया कंपनी दोबारा बाज़ार में उतर रही है और ख़ास बात ये है कि इसे लंदन में रहने वाले भारतीय मूल के संजीव मेहता ने ख़रीदा है. अगले साल इसे भारत लाने की भी योजना है.

ये वही ईस्ट इंडिया है जो अंग्रेज़ों के राज के दौरान कभी 18वीं और 19वीं सदी में भारत पर हुकूमत चलाती थी और विश्व में करीब 50 फ़ीसदी कारोबार पर इसका कब्ज़ा था.

मुंबई में जन्मे,पले-बढ़े और अब लंदन में रहने वाले संजीव मेहता इस कंपनी के मालिक है. ग़ुमनामी में खो चुकी इस कंपनी को ख़रदीने और बाज़ार में लाने का फ़ैसला आख़िर कैसे किया संजीव मेहता ने.

संजीव मेहता बताते हैं, "ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रितानी साम्राज्य ने 1874 में पूरी तरह से अपने अधीन ले लिया था.अस्सी के दशक में लंदन में कुछ 30-40 लोगों को लगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी बहुत ही शक्तिशाली ब्रैंड है.उन्होंने इसे ख़रीद लिया और फिर से बिज़नेस शुरु किया. उन्होंने काफ़ी पैसा भी लगाया. लेकिन मैने देखा कि उनका कंपनी से कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था. मालिकों में से कोई भी हिंदुस्तानी नहीं था. लेकिन भारत से होने के नाते मैं इस कंपनी का महत्व और भावनात्मक अहमियत समझ रह था. मैने कंपनी को खरीदने का फ़ैसला किया. मैने कुछ साल पहले उनसे संपर्क किया और पिछले छह वर्षों में उनसे पूरी कंपनी ख़रीद ली."

संजीव कहते हैं कि बिज़नेस के हिसाब से भी ये फ़ायदा का सौदा है क्योंकि इसके लिए पब्लिसिटी या मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं है.

गर्व का एहसास

15 अगस्त को अब लंदन के मेयफ़ेयर इलाक़े में कंपनी का स्टोर खुल रहा है जिसे लक्ज़री स्टोर के तौर पर पेश किया जा रहा है.इसमें खाद्य सामग्री, होम फ़र्नीचर वगैरह होंगे.

भारतीय मूल के होते हुए ऐसी ऐतिहासिक कंपनी को ख़रीदने के पीछे संजीव मेहता के लिए ख़ास भावनात्मक मायने हैं. इस बारे में बात करते हुए उनकी आवाज़ में एक अलग ही खनक है.

वे बताते हैं, "मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता कि मुझे कैसा महसूस हो रहा है. आप ख़ुद को मेरी जगह रखकर देखिए तो आपको अंदाज़ा होगा. गौरव का अनुभव हो रहा है, अलग सी संतुष्टि है. क्योंकि धंधा तो सब करते हैं, फ़ायदा भी बहुत लोगों को होता है लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जुड़ना कोई आम बात नहीं है. ये एक ऐसी अनुभूति है जिसकी तुलना किसी चीज़ के साथ नहीं की जा सकती. इस कंपनी को ख़रीदने के बाद मुझे दुनिया भर में बसे भारतीयों के ईमेल आए हैं.फीजी, सियरा लोन, बारबाडोस, दुबई, दक्षिण अफ़्रीका,बॉस्टन से लोगों ने संपर्क किया है. इससे हमें भी अंदाज़ा लगता है कि लोग आज भी भावनात्मक रूप से कितना जुड़े हुए हैं अपने इतिहास से. ये सिर्फ़ धंधा नहीं है. ये एक विरासत है. भारत में मेरे दोस्त, स्कूल के शिक्षक तक ने खुशी जताई है."

वर्ष 1600 में ब्रिटेन की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी को अधिकार दिए गए थे कि वो ईस्ट इंडिज़ में व्यापार करें. कंपनी ने ज़्यादातर भारतीय उपमहाद्वीप और चीन में कारोबार फैलाया. कंपनी तरह-तरह के खाद्य पदार्थ पूरब के देशों से पश्चिम में भेजने लगी.

250 सालों में कंपनी ने कपड़ों, चमड़ा, गहनों, खाद्य सामग्री, फर्नीचर का व्यापार किया. भारत पर कंपनी का पूरा दबदबा था और उसकी अपनी सेना थी और भारत पर प्रशासनिक नियंत्रण था. लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद ब्रितानी साम्राज्य ने ये अधिकार छीन लिए थे.

संजीव मेहता कहते हैं कि जिस कंपनी ने सालों साल भारत पर हुक़ूमत की उस पर हुक़ूमत करने का अगर मौका मिले तो कौन नहीं करना चाहेगा.

लेकिन 18वीं सदी की कंपनी को आज के दौर में कामयाब बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है. संजीव मेहता कहते हैं, "तीन साल तक मैने ख़ुद अध्ययन किया कि कंपनी की विरासत क्या है, दुनियाभर में इससे जुड़े म्यूज़ियमों में गया, उन देशों में गया जहाँ कंपनी का कारोबार था, उन उत्पादों को समझा जो कंपनी बेचती थी ताकि मैं समझ सकूँ कि आज के दौर में कंपनी शुरु करने का मतलब क्या होगा."

ईस्ट इंडिया कंपनी की रणनीति है कि वो धीरे-धीरे ब्रिटेन के बाहर अन्य देशों में अपने पैर पसारेगी और उसे कोई जल्दबाज़ी नहीं है.

संजीव मेहता अगले साल कंपनी को उसी हिंदुस्तानी सरज़मी पर लाने की योजना बना रहे हैं जहाँ कभी उसका डंका बोलता था. संजीव मेहता कहते हैं कि भारत पर दबदबा रखने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी विश्व में दोबारा पैर जमाएगी.. फ़र्क इतना है कि इसे एक भारतीय मूल का व्यक्ति चलाएगा.

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