ऑस्ट्रेलियाई चुनाव में जनसंख्या बना अहम मुद्दा

  • 18 अगस्त 2010
ऑस्ट्रेलिया
Image caption ऑस्ट्रेलिया में चुनाव के दौरान जनसंख्या एक अहम मुद्दा है

ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या दिल्ली और उससे सटे हुए इलाकों (एनसीआर) की जनसंख्या से थोड़ी ही ज्यादा है, लेकिन भारत में जहां चुनावों के दौरान कोई भी पार्टी जनसंख्या के मुद्दे को छेड़ना नहीं चाहती वहीं ऑस्ट्रेलिया में 21 अगस्त को होने वाले आम चुनावों में ये अहम मुद्दा है.

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रड बढ़ती जनसंख्या को बेहतर मानते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी से उनका पत्ता साफ़ करने वाली वर्तमान प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड जनसंख्या नियंत्रण की बात कर रही हैं.

यानी ऐसा ऑस्ट्रेलिया जहाँ जनसंख्या उतनी ही रहे कि पर्यावरण, मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के अनुपात में ऑस्ट्रेलिया की विकसित जीवन शैली बनी रहे.

ऑस्ट्रेलिया में जब भी जनसंख्या की बात होती है आप्रवासियों की संख्या पर भी सवाल उठते हैं. गिलार्ड के मुख्य प्रतिद्वंदी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार टोनी एबट ने हाल ही में कहा कि वो अगर चुने जाते हैं तो ऑस्ट्रेलिया आने वाले आप्रवासियों की संख्या में एक लाख तीस हज़ार की कटौती करेंगे.

जनसंख्या का मुद्दा

ऑस्ट्रेलिया के कई पर्यावरणविद भी इस बात से सहमत हैं कि जनसंख्या वाकई एक अहम मुद्दा है.

ओवरलोडिंग ऑस्ट्रेलिया के लेखक और वरिष्ठ पर्यावरणविद मार्क ओकॉनर कहते हैं, ''अर्थशास्त्री हमेशा यही चाहेंगे कि जनसंख्या बढ़ती जाए क्योंकि वो इसे एक संसाधन के रूप में देखते हैं. जितने ज़्यादा लोग उतना ज़्यादा सफल घरेलू उत्पाद. लेकिन बात सिर्फ पैसे की नहीं होती लोगों के जीवनस्तर क्या है, ये भी मायने रखता है. ''

उनका कहना है,''एक पर्यावरणविद होने के नाते में चाहूंगा कि दूसरे जीवजंतु भी हमारे साथ ज़िंदा रह सकें. ऑस्ट्रेलिया में पानी की कमी है और दुनिया में जहाँ भी रेगिस्तान होता है वहां कम लोग होते हैं. ऑस्ट्रेलिया एक सूखा महाद्वीप है इसलिए ये धारणा कि ऑस्ट्रेलिया का क्षेत्रफल बड़ा है तो यहाँ जनसंख्या बड़ी हो सकती है ग़लत है." मार्क ओकॉनर का यह भी मानना है कि अगर इतिहास देखा जाए तो यूरोप से आए लोगों से पहले भी ऑस्ट्रेलिया की मूल आबादी बहुत कम थी. लेकिन कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि ये मुद्दा आप्रवासियों की संख्या में बढ़ोत्तरी से जुड़ा है.

आप्रवासियों का योगदान

ऑस्ट्रेलियन ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स के अनुसार पिछले साल जनसंख्या वृद्धि में 64 फ़ीसदी आप्रवासियों का योगदान रहा. पिछले कुछ वर्षों में भी ये देखा गया है की जनसंख्या में बढ़ोत्तरी ऑस्ट्रेलियाई मूल के लोगों से ज़्यादा आप्रवासियों के कारण हुई है.

Image caption प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड भी जनसंख्या नियंत्रण की बात कर रही हैं

इस विषय पर ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों के अध्यक्ष और सामाजिक आलोचक प्रोफ़ेसर ग्लेन विदर्स कहते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के फायदे भी हैं और नुकसान भी. जनसंख्या, आर्थिक प्रगति, सामाजिक विकास और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन होना चाहिए.

लेकिन वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि आप्रवासियों के आने से ऑस्ट्रेलिया को आर्थिक स्तर पर फायदा हुआ है. सवाल ये भी है कि जनसंख्या में वृद्धि आप्रवासियों कि बजाय मूल निवासियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण होती तब भी क्या लोग इस विषय पर इतनी ही बात करते?

प्रोफ़ेसर ग्लेन विदर्स का मानना है, "कुछ लोग वाकई पर्यावरण के लिए चिंतित है, कुछ लोग शहरों में बढ़ती भीड़-भाड़ से परेशान हैं. इसलिए अगर जनसंख्या में वृद्धि आप्रवासियों कि बजाय घरेलू आबादी में बढ़ोत्तरी के कारण भी होती तब भी लोग इस विषय में बात करते.''

वो कहते हैं,'' हालांकि कुछ लोग ऐसे ज़रूर हैं जिन्हें लगता है कि अगर बाहर से बहुत ज़्यादा लोग आते हैं तो यह ऑस्ट्रेलियाई जीवन शैली के लिए ख़तरा हो सकता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में अप्रवास होता रहा है. जहां तक जनसंख्या का सवाल है तो आज की परिस्थितियों में मूल निवासियों और आप्रवासियों की संख्या के बीच संतुलन होना चाहिए."

भारत बनाम आस्ट्रेलिया

भारत से इसकी तुलना करें तो ये ख़्याल आता है कि जहां भारत में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता जनसंख्या के मुद्दे पर अपनी ज़ुबान पर ताला लगा लेते हैं वहीं ऑस्ट्रेलिया में नेता ही नहीं बल्कि आम आदमी भी जनसंख्या के मुद्दे को अहमियत देते हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर टेरेंस हल कहते हैं, " हम ऐसी परिस्थिति नहीं चाहते जहाँ पूरे महाद्वीप पर सब कुछ ख़त्म हो चुका हो और लोगों का जीवनस्तर गिर जाए. दो बातें बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, पहली ये कि लोगों का जीवनस्तर अच्छा रहे और ऐसा रहे जिससे पर्यावरण और संसाधनों के बीच संतुलन रहे. दूसरा ये कि प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह किया जाए कि भविष्य में भी इस महाद्वीप पर रहा जा सके. लोग देश के भविष्य के बारे में सोचते हैं और यही वजह है कि जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधनों के बारे में विचार-विमर्श होता है.'' ऑस्ट्रेलिया की आबादी मणिपुर या त्रिपुरा की आबादी से भी कम है लेकिन फिर भी यहाँ जनसंख्या एक महत्वपूर्ण मुद्दा है.

इससे और कुछ साबित हो न हो इस बात के संकेत ज़रूर मिलते हैं कि यहाँ के लोगों की सोच कितनी दूरगामी है.

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