'40 लाख बच्चे बच सकते थे'

  • 7 सितंबर 2010
Image caption विकासशील देशों में सरकारें मध्यम आय वालों की ही मदद करती हैं गरीबों की नहीं

अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संस्था सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि अगर सरकारें गरीब परिवारों पर ध्यान दें तो पाँच साल से कम उम्र के लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकती है.

यूनीसेफ ने भी अपनी एक रिपोर्ट में ऐसी ही बातें कही हैं.

यूनीसेफ और सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्टें ऐसे समय में आई हैं जब अगले महीने के अंत में दुनिया भर के नेता सहस्राब्दि लक्ष्यों पर हुई प्रगति की समीक्षा के लिए न्यूयॉर्क में मिलने वाले हैं.

सहस्राब्दि विकास से जुड़े लक्ष्य 2015 तक के लिए थे जिसके तहत दुनिया भर में गरीबी और दुख को एक हद तक कम करने का उद्देश्य रखा गया था.

अभी आई रिपोर्टों से लगता नहीं है कि इन उद्देश्यों में कोई ख़ास प्रगति हो पाई है या फिर लक्ष्यों को 2015 तक पूरा किया जा सकेगा.

सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट 'ए फेयर चांस एट लाइफ' के अनुसार पिछले दस साल में कम से कम चालीस लाख ऐसे बच्चों की मौत हुई है जिन्हें मरने से बचाया जा सकता था.

रिपोर्ट कहती है कि जिस तरह से सरकार ने अमीरों के बच्चों को बचाने की कोशिश की है वैसी कोशिश गरीबों के लिए नहीं की गई. सहस्राब्दि लक्ष्यों के अनुसार 2015 तक शिशु मृत्यु दर को दो तिहाई कम करना था लेकिन ये लक्ष्य पूरा नहीं होता दिखता है.

सेव द चिल्ड्रेन की प्रमुख जैस्मीन वाइटब्रेड कहती हैं कि हर साल पाँच साल से कम उम्र के 90 लाख बच्चों की मौत हो जाती है. उनका कहना है कि सरकार के लिए यह सुविधाजनक होता है कि वो मध्यम आय वाले परिवारों की मदद करें.

सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि हर विकासशील देश में यही परंपरा देखी गई कि मदद उसी को ज्यादा मिले जिसकी आय थोड़ी बहुत ज़रुर है. हालांकि सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि अगर ग़रीबों को मदद मुहैय्या कराई जाए तो शिशु मृत्यु दर को कम करना ज्यादा आसान होगा.

उधर यूनीसेफ का कहना है कि विकासशील देशों में ग़रीब घरों के बच्चों के मरने की संभावना अमीर घरों के बच्चों की तुलना में दोगुनी होती है. इन गरीब परिवारों की स्थिति दिन ब दिन नाजुक होती जा रही है.

यूनीसेफ का भी यही कहना है कि कई देशों में ये देखा गया है कि अगर गरीब परिवारों पर ध्यान दिया जाए तो शिशु मृत्यु दर को कम करना आसान रहता है.

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