इराक़ में अबतक 230 पत्रकारों की मौत

  • 11 सितंबर 2010
Image caption इराक़ में अभिव्यक्ति की आज़ादी तो मिली है लेकिन उसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ रही है.

पत्रकारों के हक़ के लिए काम करनेवाली एक फ्रांसीसी संगठन ने कहा है कि इराक़ में 2003 में शुरू हुए युद्ध के बाद से अबतक 230 पत्रकार वहां मारे जा चुके हैं.

रिपोर्टर्स विदआउट बोर्डर्स नामक इस संस्था का कहना है कि इस लिस्ट में कई विदेशी पत्रकार भी हैं लेकिन ज़्यादातर इराक़ी पत्रकार हैं जो भारी ख़तरा उठाकर भी अपना काम कर रहे हैं.

मंगलवार को आई इस रिपोर्ट के बाद से दो और टेलिविज़न पत्रकारों की हत्या हो गई है.

ओमर अल जबोरी एक स्थानीय इराक़ी टीवी चैनल में काम करते हैं.

इस साल अप्रैल में जब वो दफ़्तर जा रहे थे तो उनकी कार की ड्राइवर सीट के नीचे भयानक बम विस्फोट हुआ.

किसी ने कार के नीचे एक चुंबकीय बम लगा दिया था.

ओमर कहते हैं, “मैंने अपने आपको सड़क पर गिरा हुआ पाया. मैं समझ नहीं पा रहा था क्या हुआ है. लेकिन जब मैने अपनी एक टांग कार के अंदर देखी और दूसरी सड़क पर गिरी हुई तो मैं समझ गया. मैने अपना बेल्ट निकाला और अपने पांव का जो बचा-खुचा हिस्सा था उसके इर्द गिर्द लपेट लिया.”

ओमर अब व्हीलचेयर पर चलते हैं और उनके दोनों पांव घुटने के उपर से काट दिए गए हैं.

रियाद अल सराय उतने भाग्यशाली नहीं थे.

इराक़िया सरकारी टेलिविज़न के जाने-माने इस प्रस्तुतकर्ता को पिछले मंगलवार को साइलेंसर लगी बंदूक से सड़क पर गोली मार दी गई. उनके सहयोगियों को भी नहीं अदाज़ा है कि उनकी हत्या क्यों की गई.

उसके ठीक एक दिन बाद इराक़ के उत्तरी शहर मोसुल में एक और टीवी पत्रकार, सफ़ा अब्दुल हमीद, की हत्या कर दी गई.

मंहगी आज़ादी

कई पत्रकार सैनिकों और चरमपंथियों की मुठभेड़ के दौरान गोलीबारी में मारे गए हैं तो कुछ ऐसे बम धमाकों में जिनका इरादा विशेष रूप से पत्रकारों को निशाना बनाना नहीं था.

लेकिन कई ऐसे हैं जिन्हें ख़ासतौर पर निशाना बनाया गया है.

पत्रकारों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले पत्रकार बशर अल मदालवी का कहना है कि पत्रकारों पर हुए हमलों के लिए शायद ही किसी को सज़ा मिली हो.

ओमर अल जबोरी अब दफ़्तर जाने लगे हैं. व्हील चेयर की भी आदत सी हो गई है उन्हें.

और इतना कुछ हो जाने के बाद भी वो पत्रकारिता नहीं छोड़ना चाहते क्योंकि वो अभिव्यक्ति की आज़ादी की हर हाल में रक्षा करना चाहते हैं.

ये आज़ादी इराक़ के लिए नई चीज़ है लेकिन इसके लिए भारी कीमत चुकाई जा रही है.

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