बदलेगा तुर्की का संविधान

अर्दोगान जनमत संग्रह में वोट डालते हुए

तुर्की में रविवार को हुए जनमत संग्रह में मतदाताओं ने देश के संविधान में व्यापक परिवर्तनों के पक्ष में जनादेश दिया है.

स्थानीय टेलीविज़न चैनल एनटीवी के अनुसार 99 प्रतिशत मतों की गिनती होने तक सांवैधानिक सुधार के पक्ष में 58 प्रतिशत मत पड़े थे.

जनता के सामने एकमुश्त 26 संविधान संशोधनों का प्रस्ताव रखते हुए सरकार ने दलील दी थी कि वह देश के संविधान को यूरोपीय संघ के मानकों के अनुरूप ढालना चाहती है.

उल्लेखनीय है कि तुर्की यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए वर्षों से प्रयासरत है.

दूसरी ओर तुर्की के विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रधानमंत्री रजप तैयप अर्दोगान की सत्तारूढ़ जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी(एकेपी) न्यायपालिका के अधिकारों में कटौती करना चाहती है जो कि लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है.

तुर्की का मौजूदा संविधान 1980 के दशक में सैनिक शासन के तहत तैयार किया गया था, और इसमें बदलावों को लेकर लंबे अरसे से बहस चलती रही है.

व्यापक सुधार

संविधान संशोधनों के ज़रिए तुर्की की सेना को असैनिक अदालतों के प्रति ज़्यादा ज़िम्मेवार बनाया जाएगा. इसमें जजों की नियुक्तियों में संसद को पहले से ज़्यादा अधिकार देने की बात है.

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव है- सरकारी कर्मचारियों को समझौते और हड़ताल करने का अधिकार देना.

ज़्यादातर संविधान संशोधनों पर किसी तरह का विवाद नहीं है.

लेकिन 26 में से दो संविधान संशोधन प्रस्तावों पर प्रधानमंत्री अर्दोगान के समर्थकों और उनके विरोधियों में मतभेद हैं. इन दो संशोधनों का घोषित लक्ष्य तो है तुर्की की न्यायिक व्यवस्था में सुधार करना, लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि इनके ज़रिए सरकार न्यायपालिका को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेना चाहती है.

उल्लेखनीय है कि तुर्की की न्यायपालिका और सरकार में अक्सर टकराव होते रहे हैं. धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर तुर्कों की नज़र में ये न्यायपालिका ही है जो प्रधानमंत्री अर्दोगान की इस्लामी बुनियाद वाली पार्टी एकेपी को नियंत्रित रख पाती है.

दूसरी ओर अर्दोगान अदालतों पर राजनीति से प्रेरित फ़ैसले सुनाने का आरोप लगाते रहे हैं.

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