प्रतिनिधिमंडल जम्मू जाएगा

  • 20 सितंबर 2010
सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल
Image caption जम्मू में लोगों को सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से ख़ास उम्मीदें नहीं हैं

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम के नेतृत्व में दिल्ली से एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल ने सोमवार को भारत प्रशासित कश्मीर में बहुत लोगों से मुलाक़ात की है. जिसमें राजनीतिक दल, अलगाववादी नेता और व्यापार और उद्योग जगत के लोग शामिल हैं.

यह प्रतनिधिमंडल मंगलवार को जम्मू जा रहा है.

पिछले तीन महीनों से आज़ादी की माँग को लेकर हो रहे हिंसक प्रदर्शनों के बाद स्थिति का जायज़ा लेने के लिए यह प्रतिनिधिमंडल भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर के दौरे पर है.

यह प्रतिनिधिमंडल राज्य के विभिन्न राजनीतिक दलों और गुटों से बात कर रहा है और कश्मीर समस्या के हल की संभावना तलाश कर रहा है.

दौरे की अहमियत

हिन्दू बहुमत वाले जम्मू क्षेत्र में इस दौरे को एक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. लोगों का कहना है कि ये दौरा जम्मू और कश्मीर के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक क़दम होगा.

केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल का यह दौरा जम्मू के निवासियों के लिए वैसे तो एक प्रतीक मात्र ही है.

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि राजनेता हों या व्यापारी या फिर समाज के अन्य वर्गों के लोग, सभी अपनी बात प्रतिनिधिमंडल के समक्ष रखना चाहते हैं.

जम्मू चेंबर ऑफ़ कामर्स और इंडस्ट्री के अध्यक्ष वाईपी शर्मा भी अपने व्यापारी साथियों के साथ इस दल से मुलाक़ात करेंगे.

उनका कहना है, "कश्मीर घाटी में चल रही हिंसा और ख़राब हालात का सब से अधिक नुक़सान हम जम्मू के व्यापारियों को हुआ है."

भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल के नेता प्रोफ़ेसर चमन लाल गुप्ता का मानना है कि जम्मू कश्मीर राज्य आज जिस स्थिति का सामना कर रहा है, वह प्रभावशाली प्रशासन के अभाव के कारण है."

उनका कहना था “यह केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल इस में क्या कर सकेगा. सही बात तो यह है कि मौजूदा सरकार ने पिछले चुनाव में 60 प्रतिशत मतदान को बेकार कर दिया है."

प्रोफ़ैसर गुप्ता कहते हैं, "हम प्रतिनिधिमंडल से मिलेंगे और अपना बरसों पुराना पक्ष भी उनके सामने रखेंगे, लेकिन हमें इस मुलाक़ात से कुछ ठोस नतीजों की आशा कम ही है."

कश्मीरी विस्थापित समुदाय भी अलग-अलग गुटों में बंटा हुआ है.

असंतुष्ट दल

पनुन कश्मीर के संयोजक डॉ. अग्निशेखर भी इसे एक "निरर्थक क़दम" बताते हैं.

उनके संगठन को प्रतिनिधि मंडल से मिलने का निमंत्रण नहीं आया है.

उनका कहना है, "सरकार ने अपने पक्षधरों को ही बुलाया है. वैसे भी इस दौरे का कोई लाभ नहीं होगा. यह सांसद सिर्फ़ बात सुनेंगे और चले जाएंगे."

जम्मू कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी ने प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार कर दिया है.

पार्टी के विधायक बलवंत सिंह मनकोटिया का कहना है, "हमें दिल्ली में हुई सर्वदलीय बैठक में नहीं बुलाया गया था, इसीलिए हम यहाँ उनसे नहीं मिल रहे हैं."

प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना था, कि दिल्ली की बैठक में केवल उन दलों को बुलाया गया था, जिनके प्रतिनिधि संसद में हैं और पैंथर्स पार्टी का कोई भी सांसद नहीं है.

मनकोटिया का कहना था कि पीडीपी का भी कोई सांसद नहीं है लेकिन उन्हें सर्वदलीय बैठक में बुलाया गया था.

जम्मू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ैसर रेखा चौधरी का कहना है, कि बातचीत भले ही कश्मीर के मौजूदा मसले पर होगी, लेकिन जम्मू और लद्दाख़ की आवाज़ की सुनवाई भी जम्मू-कश्मीर के मसले के हल के लिए ज़रूरी होगी.

उनका कहना है, "इस में कोई दो राय नहीं है कि मंगलवार को यह प्रतिनिधिमंडल जम्मू में केवल इसलिए आ रहा है कि यहाँ से भेदभाव की आवाज़ न उठे, अन्यथा इस समय बातचीत और विचार विमर्श का केंद्र तो कश्मीर ही है, जहाँ पर अशांति बनी हुई है."

राजनितिक मुद्दों पर देखा जाए, तो जम्मू की राय कश्मीर से बिलकुल भिन्न है.

जम्मू के लोग जम्मू कश्मीर राज्य को देश का अभिन्न अंग मानते हैं इसलिए स्वायत्तता और स्वशासन जैसी बात यहाँ नहीं उठती है.

लेकिन राज्य में कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार चला रही नैशनल कॉन्फ़्रेंस राज्य के लिए अधिक स्वायतता की मांग कर रही है, जो सन 1953 से पूर्व थी और

विपक्षी पीडीपी भी राज्य में स्वशासन की समर्थक है.

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