आर्कटिक पर अपने अपने दावे

Image caption रूस ने उत्तरी ध्रुव के नीचे सागर के तल पर टाइटेनियम का राष्ट्रध्वज लगाया है

आर्कटिक को भावी युद्धक्षेत्र बनने से रोकने के लिए मॉस्को में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा है.

ये क्षेत्र विशाल खनिज सम्पदा से सम्पन्न है. समझा जाता है कि आर्कटिक सागर के नीचे दुनिया के तेल और गैस के कुल भंडार का एक चौथाई हिस्सा मौजूद है.

रूस, नौर्वे, कनाडा, डैनमार्क और अमरीका पहले ही इस क्षेत्र के हिस्सों पर अपना अपना दावा ठोक चुके हैं.

इस बैठक में कोई 300 प्रतिनिधि हिस्सा लेने आए हैं जिससे सहयोग का कोई रास्ता निकाला जा सके.

जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तरी ध्रुव में जमी बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है जिससे इस क्षेत्र के संसाधनों तक पहुंचना आसान होता जा रहा है.

मॉस्को ने 2001 में संयुक्त राष्ट्र को अपना क्षेत्रीय दावा प्रस्तुत किया था जिसे प्रमाणों के अभाव में रद्द कर दिया गया.

लेकिन तीन साल पहले एक रूसी अभियान ने उत्तरी ध्रुव के नीचे सागर के तल पर टाइटेनियम का राष्ट्रध्वज लगाया जिससे रूस की महत्वाकांक्षा का अनुमान लगाया जा सकता है.

उसने प्रमाण जुटाने के लिए शोध पर 64,000000 डॉलर ख़र्च करने की घोषणा की है.

कैनेडा और डैनमार्क भी अपने अपने दावे संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत करने की योजना बना रहे हैं.

पिछले सप्ताह कैनेडा के विदेश मंत्री मॉस्को में रूसी विदेश मंत्री से मिले थे जिससे अपने अपने दावों पर विचार कर सकें.

समुद्री क़ानून

आर्कटिक क्षेत्र के संसाधनों पर अपना अधिकार जमाने की ये दौड़ समुद्र के नीचे स्थित एक पर्वतीय श्रंखला पर केंद्रित है जिसे लोमोनोसॉफ़ रिज कहा जाता है.

विवाद में उलझे देशों को ये वैज्ञानिक प्रमाण देना होगा कि लोमोनोसॉफ़ रिज उनकी महाद्वीपीय पट्टी का ही विस्तार है.

संयुक्त राष्ट्र के समुद्री क़ानून के अधीन कोई भी तटीय राष्ट्र अपनी भूमि सीमा से 370 किलोमीटर दूर तक समुद्र तल के ऊपर और नीचे के प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार का दावा कर सकता है.

लेकिन अगर उनकी महाद्वीपीय पट्टी इस दूरी से आगे तक जा रही है तो उस देश को संयुक्त राष्ट्र के सामने इसका प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ेगा जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र का आयोग बाहरी सीमा निर्धारित करने की सिफ़ारिश करेगा.

क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर भले ही इन देशों के बीच रस्सा कशी चल रही हो रूस ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर बल दिया है.

रूस के आर्कटिक विशेषज्ञ लेव वोरोनकॉफ़ का कहना है कि शीत युद्ध के अनुभव ने ये साबित कर दिया है कि मिल कर काम करना ज़रूरी है.

"आर्कटिक की कोई भी समस्या कोई एक देश अकेला नहीं सुलझा सकता. इसलिए मेरे विचार में हमें सहयोग करना ही होगा. और इस मामले में किसी तरह का सैन्य संघर्ष प्रतिकूल साबित होगा".

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