डेढ़ अरब लोग ग़रीबी से जूझ रहे हैं: संयुक्त राष्ट्र

  • 22 सितंबर 2010

संयुक्त राष्ट्र में भूख और ग़रीबी से निपटने के तरीक़े पर विचार करने के लिए चल रहे सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य नामक इस सम्मेलन में बताया गया है कि विश्व में अब भी डेढ़ अरब लोग ग़रीबी और भुखमरी की समस्याओं से जूझ रहे हैं.

सम्मेलन में दुनिया के करीब 140 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और राजनेता भाग ले रहे हैं.

इस तीनदिवसीय सम्मेलन में ग़रीबों के उद्धार और भुखमरी को ख़त्म करने के विभिन्न तरीकों और पहलुओं पर चर्चा हो रही है.

वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने ग़रीबी और भूख की समस्या को आधा ख़त्म करना, शिशु मृत्यु दर को कम करना और प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने जैसे कुल आठ लक्ष्यों को 2015 तक पाने का लक्ष्य बनाया था.

इनमें महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करना, पर्यावरण संबंधी मामले और विश्व के अधिकतर लोगों को साफ़ पानी और शौचालय मुहैया कराना भी शामिल है.

पिछले 10 वर्षों में इन लक्ष्यों पर काम करने के बाद विश्व के कुछ हिस्सों में कुछ लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर लाने में कामयाबी मिली है.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक विश्व में अब भी डेढ़ अरब लोग ग़रीबी और भुखमरी की समस्याओं से जूझ रहे हैं.

इनके अलावा भी अन्य लक्ष्यों में से ज़्यादातर के पूरे होने की उम्मीद नहीं की जा रही है.

पूरब और पश्चिम

इस बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा का मंच पूरब और पश्चिम के देशों के बीच तक़रार का अखाड़ा बना हुआ है. सम्मेलन के दूसरे दिन मंगलवार को ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने अपने भाषण के दौरान पूंजीवाद के सहारे पश्चिमी दुनिया और सभ्यता पर हमला बोल दिया.

उन्होंने भविष्यवाणी की कि पूंजीवाद के दिन अब लद चुके हैं और वह अपनी आखरी सांसें गिन रहा है.

उन्होंने पूंजीवाद को विश्व के करोड़ों लोगों की मुश्किलों का ज़िम्मेदार ठहराया.

अहमदीनेजाद ने कहा,'' मुझे यकीन है कि अब विश्व के अहम संस्थानों में जहां अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों का बोलबोला है वहां बड़े पैमाने पर बदलाव लाए जाएंगे. और एक नए वैश्विक व्यवस्था की शुरूआत की जानी चाहिए जिसमें फ़ैसले लेने वाले दुनिया भर के ऐसे लोग हों जो ग़रीबों के हित की बात करें.''

ईरानी राष्ट्रपति ने यह भी मांग की कि संयुक्त राष्ट्र अगले दशक को एक साझी विश्व सरकार का दशक घोषित कर दे.

लेकिन उन्होंने अपने भाषण के दौरान ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम के लिए लगाए गए प्रतिबंधों का कोई ज़िक्र नहीं किया.

वैसे अभी वह दो दिनों के बाद महासभा के विशेष अधिवेशन में फिर भाषण देंगे तो उम्मीद की जा रही है कि उसमें वह अमरीका को और आड़े हाथों लेंगे और सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों का भी ज़िक्र हो सकता है.

ईरान राष्ट्रपति के बाद जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने अपने भाषण में पूंजीवाद को बहुत से ग़रीब देशों की मदद करने का ज़िम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा, “सभी देशों को बाज़ारवाद की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए क्योंकि अपने बलबूते पर ग़रीब देश भूख और ग़रीबी से बाहर नहीं निकल पाएंगे.”

मुगाबे का गुस्सा

इसके अलावा ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे ने भी पश्चिमी देशओं के ख़िलाफ़ अपना गुस्सा निकाला.

उन्होंने कहा, “मेरे देश के ख़िलाफ़ जो आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं उसके कारण हम अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पा रहे हैं. अब अमीर देशों को ग़रीब देशों से उनकी मदद करने के लिए किए गए वादे पूरे करने होंगे. ”

लेकिन इस सम्मेलन में कई देशों ने इस बाद पर ज़ोर दिया कि ग़रीबी और अन्य मुद्दों पर तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अब भी बड़ी धन राशि की ज़रुरत है जबकि विश्व बैंक ने इस सिलसिले में 9.5 अरब डॉलर और देने का फ़ैसला किया है.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कह चुके हैं कि सिर्फ़ ग़रीबी और भूख से निपटने के लिए ही अगले पाँच साल में सौ अरब डॉलर से अधिक धनराशि की ज़रुरत होगी.

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