ग्वांगडोंग में दो बच्चों को अनुमति

दंपत्ति
Image caption चीन में दंपत्तियों को एक ही बच्चा पैदा करने की अनुमति है.

चीन के सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रांत ग्वांगडोंग में एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि 2030 के बाद सभी दंपतियों को एक बच्चे की नीति से मुक्ति मिल जाएगी और उन्हें दो बच्चों की अनुमति मिलेगी.

यह फ़ैसला इसलिए लिया गया है ताकि चीन में वृद्ध होती आबादी की समस्या का सामना करने में मदद मिले.

चीन में तीस साल पहले एक शिशु नीति लाई गई थी ताकि बढ़ती हुई जनसंख्या को रोका जा सके लेकिन कई मामलों में इसमें छूट दी गई है.

जब चीन में ‘एक परिवार एक शिशु’ नीति को लाया गया था, तब उसकी जनसंख्या एक अरब को छूने वाली थी और इन तीस सालों में वो बढ़ कर 1.3 अरब हो गई है.

जहां चीनी सरकार का दावा है कि इस नीति के आने से जनसंख्या में हो रही लगातार बढ़ोत्तरी में कमी आई है, वहीं इस नीति के लागू होने के बाद की पीढ़ियों में व्यापक बदलाव देखे गए हैं.

उनमें से एक ये है कि वहां बुज़ुर्गों की जनसंख्या बढ़ गई है लेकिन उनकी देखभाल के लिए जवान लोगों की वहां भारी कमी हो गई है.

कम्युनिस्ट देश चीन का जनक माने जाने वाले चेयरमैन माओ का मानना था कि चीन में बढ़ती जनसंख्या देश की बढ़ती उत्पादक ताक़त का प्रतीक है लेकिन उनके उत्तराधिकारी डेंग ज़ियाओपिंग ने इस चलन को बदल डाला और 1978 में ‘एक परिवार एक शिशु’ नाम की नीति लागू की जिसके तहत एक से ज़्यादा शिशु पैदा करने वाले दंपति पर भारी जुर्माना लगाया जाने लगा.

उनका मानना था कि बढ़ती जनसंख्या से चीन की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.

सरकार का दावा है कि इस नीति के लागू होने से लेकर अबतक 40 करोड़ कम शिशु पैदा हुए हैं लेकिन क्या वाकई इस नीति से चीन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है?

शांघाई के एक सामाजिक नीति अनुसंधान संस्थान के एक प्रोफेसर का कहना है कि इस नीति के परिणाम चीन के हित में आए हैं.

वो कहते हैं, ‘‘ मुझे लगता है कि ‘एक परिवार एक शिशु’ नीति का परिणाम पिछले तीस सालों में चीन के हित में रहा है. इससे चीन की औसतन जनसंख्या बढ़ोत्तरी दर में काफी गिरावट आई है और यहां की अर्थव्यवस्था में विकास देखने को मिला है.’’

Image caption चीन में एक बड़ी आबादी बूढ़ी हो रही है लेकिन उनकी देखभाल मुश्किल होती जा रही है.

लेकिन इस नीति की एक भारी क़ीमत वहां के वृद्ध लोगों को अदा करनी पड़ रही है जिनकी देख रेख के लिए जवान लोगों की भारी कमी हो गई हैं.

चीन में ‘एक परिवार एक शिशु’ नीति पर लंबे समय से बहस चल रही है और हाल ही में आई एक रिपोर्ट के बाद ये मुद्दा और भी गर्मा गया.

रिपोर्ट में बताया गया कि शांक्सी प्रांत के यिचेंग कंटरी में, जहां परिवार में दो बच्चे होने की योजना पर प्रयोग किया गया, वहां की औसतन जन्संख्या बढ़ोत्तरी का दर कम पाया गया.

इस रिपोर्ट के आधार पर चीन की ग्वांगडोंग प्रांत में जन्संख्या निरोधी शाखा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि 2030 से प्रांत के सभी दंपतियों को दो बच्चे पैदा करने की अनुमति होगी.

ग़ौरतलब है कि गत जून में चीन के शांघाई प्रांत में भी लोगों को दूसरा शिशु पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया था और इस चलन में अब तेज़ी आ रही है.

कुछ लोग तो दूसरा शिशु रखने के लिए जुर्माना भी अदा करने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि उनके मुताबिक चीनी सरकार की एसी नीति मानवाधिकार का हनन करने जैसा है. इस नीति का विरोध करते आ रहे प्रोफेसर यांग ज़िज़ू की पत्नी ने बताया कि उन्होंने ये क़ानून क्यों तोड़ा.

वो कहती हैं, ‘‘हमें इस क़ानून का उल्लंघन करने के नतीजे मालूम हैं, इसलिए हम इसके खिलाफ जाने के ख़याल से हिचकिचाते थे. लेकिन हमने फ़ैसला किया कि हम अपना बच्चा किसी भी क़ीमत पर नही गिरा सकते. मेरे लिए मेरे गर्भ में हमारा बच्चा भी एक ज़िंदगी के बराबर था.’’

अब तक ये तो साफ़ नही हुआ है कि चीन ‘एक परिवार एक शिशु’ की नीति कब ख़त्म करेगा लेकिन ये साफ है कि चीन की बूढ़ी होती आबादी की स्थिति काफ़ी गंभीर होती जा रही है और इसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता.

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