ओबामा की भारत यात्रा के कुछ पहलू

बराक ओबामा
Image caption ओबामा 5 नवम्वर से तीन दिनों की यात्रा पर भारत आ रहे हैं

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा नवंबर के पहले हफ़्ते में तीन दिनों की भारत यात्रा पर जाएंगे. लेकिन उनके दौरे को लेकर भारत में वो उत्साह नज़र नहीं आ रहा, जो चार साल पहले राष्ट्रपति के रूप में जॉर्ज बुश की यात्रा के समय देखा गया था.

कारण शायद यह हो कि बुश के दौरे के समय भारत और अमरीका के बीच परमाणु समझौते की प्रक्रिया चल रही थी जिसे कुछ लोगों ने अमरीका की तरफ़ से भारत को दी गई एक भेंट क़रार दिया था.

अमरीका में विदेशी मामलों के विशेषज्ञ जॉर्ज पर्कोविच कहते हैं, "बुश का दौरा एक रोमांचक क्षण था. परमाणु संधि को लेकर काफ़ी उत्साह था. दोनों देशों में उम्मीदें अवास्तविकता की हदों को छू रहीं थीं. अब ये रिश्ता हक़ीकत पर आधारित है. दोनों देशों के अपने-अपने हित हैं. अमरीका एक विकसित देश है उसकी उम्मीदें अलग हैं. भारत एक विकासशील देश है इसकी आशाएं भिन्न हैं. दोनों लोकतंत्र हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों की ज़रूरतें भी एक सी हों."

अपना तर्क साबित करने के लिए जॉर्ज पर्कोविच ईरान का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अमरीका चाहता है कि ईरान को अंतरराष्ष्ट्रीय रूप से अलग-थलग करने की उसकी कोशिश में भारत उसका भरपूर साथ दे.

लेकिन भारत और ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते हैं और हर मामले में भारत अमरीका का साथ नहीं देता है.

जॉर्ज पर्कोविच ने 'इंडियाज़ न्यूक्लियर बॉम' नाम की एक पुस्तक भी लिखी है.

परस्पर सहयोग

अमरीका में भारत की राजदूत मीरा शंकर के अनुसार दोनों देशों के बीच का रिश्ता फल फूल रहा है.

उन्होंने कहा, "हम हर क्षेत्र में एक दूसरे के साथ काम कर रहे हैं. चाहे वो आर्थिक क्षेत्र हो या सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य या कृषि. मुझे लगता है कि ये एक ऐसा रिश्ता है जो इक्कीसवीं सदी के लिए बहुत मायने रखता है"

तो क्या ये कहा जा सकता है कि दोनों देशों के बीच रिश्ता अब एक मज़बूत पार्टनरशिप में बदल गया है?

Image caption राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा ने सबसे पहले मनमोहन सिंह को अमरीका आने का निमंत्रण दिया था

वाशिंगटन के अधिकतर विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते हैं.

जॉर्ज पर्कोविच का कहना है कि ओबामा अब तक चीन और पाकिस्तान पर ज़्यादा ध्यान देते आये हैं.

लेकिन भारत के अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वॉशिंगटन स्थित वरिष्ठ पत्रकार चिदानंद राजघट्टा मानते हैं रिश्तों के मज़बूत होने की एक प्रक्रिया है.

वह कहते हैं, "मुझे नहीं लगता है कि ओबामा ने चीन और पाकिस्तान से ज़्यादा संपर्क रखा है. अब तक वे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से अलग अलग जगहों पर आठ बार मिल चुके हैं. पाकिस्तान और चीन के नेताओं से कहीं ज़्यादा बार. ये रिश्ता राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के समय से ही मज़बूत होता चला आ रहा है."

राजदूत मीरा शंकर के अनुसार राष्ट्रपति ओबामा 32 सालों में ऐसे पहले अमरीकी राष्ट्रपति हैं जो अपने पहले कार्यकाल में भारत के दौरे पर जा रहे हैं.

आर्थिक मुद्दे

ओबामा एक ऐसे समय भारत जा रहे हैं जब अमरीका में बेरोज़गारी नौ प्रतिशत से अधिक है और देश की अर्थव्यवस्था संकट में है.

इस दौरे में एक बड़ा व्‍यापारि‍क प्रतिनिधिमंडल ओबामा के साथ होगा जो इस बात को स्पष्ट करता है कि वे आर्थिक रिश्तों को मज़बूत करने में ख़ासी दिलचस्पी रखते हैं.

भारत के बाज़ार खुलने से अमरीकी कंपनियों को मदद मिलेगी, देश में नई नौकरियों के अवसर पैदा होंगे जो अमरीकी अर्थजगत के लिए अच्छी ख़बर होगी.

चिदानंद राजघट्टा कहते हैं, "सच्चाई ये भी है कि अमरीका भारत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. पिछले तीनों अमरीकी राष्ट्रपतियों ने भारत का दौरा किया है. मुझे लगता है आने वाले दिनों में हर अमरीकी राष्ट्रपति भारत जाएगा".

आर्थिक विषयों की चर्चा करते समय ये बताना ज़रूरी है कि भारत की सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियाँ अमरीका की आउट सोर्सिंग और वीज़ा फीस बढ़ने की पालिसी से ख़ुश नहीं हैं और उनका इरादा है कि वे मुंबई में राष्ट्रपति से मुलाक़ात के दौरान इस मुद्दे को उठाएंगी.

भारत और पाकिस्तान

भारतीय राजदूत मीरा शंकर का कहना है कि दौरे के बीच दूसरे अहम मुद्दों पर भी चर्चा होगी, “ये एक महत्वपूर्ण दौरा होगा जिसमें पिछले कुछ सालों में हुई उपलब्धियाँ और मज़बूत होंगी जो भारत-अमरीकी सामरिक सहयोग और महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भविष्य की दिशा निर्धारित करेंगी."

अमरीका ने हाल ही में पाकिस्तान को दो अरब डालर की एक सैन्य मदद देने का ऐलान किया है ताकि पाकिस्तान आतंकवाद की लड़ाई में अमरीका से सहयोग बरक़रार रख सके.

लेकिन मीरा शंकर के अनुसार भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि पाकिस्तान इसका उपयोग भारत के ख़िलाफ़ कर सकता है.

भारत प्रशासित कश्मीर के अलगाववादी इस कोशिश में हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति कश्मीरी नेताओं से मुलाक़ात करें और इस मामले में हस्तक्षेप करें.

लेकिन अमरीकी अधिकारियों ने अब तक इस मामले पर खुल कर कुछ नहीं कहा है.

इस तरह के संकेत हैं कि ओबामा कश्मीर के मुद्दे को उठाकर भारत की नाराज़गी मोल नहीं लेंगे.

वॉशिंगटन में यह ख़बर गर्म है कि भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थाई स्थान पाने की अपनी कोशिशों में अमरीकी राष्ट्रपति की हिमायत चाहेगा लेकिन जानकारों का कहना है कि ओबामा शायद इस पर भारत से कोई स्पष्ट वादा नहीं करेंगे.

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