ओबामा के दिलो-दिमाग़ पर अर्थव्यवस्था

  • 3 नवंबर 2010

बराक ओबामा के मन में मध्यावधि चुनाव में अपनी पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद केवल एक एजेंडा रहेगा, और वो है अमरीकी जनता के लिए नौकरियां पैदा करना और देश की आर्थिक स्थिति को सुधारना क्योंकि उन्हें मंदी की मार सीधे चुनावी हार में तब्दील होती दिख रही है.

यानि कूटनीति और सामरिक नीति से ज़्यादा अर्थनीति उनके भारत के कार्यक्रम पर हावी रहेंगी.

अमरीका को भारत एक बड़े बाज़ार के रुप में नज़र आ रहा है जहां लगातार 9 -10 प्रतिशत के आस पास विकास का आकलन है जबकि अमरीका में मंदी के बादल अभी छटे नहीं है.

अभी भारत अमरीका का 16वां या 17वां बड़ा व्यापार सहयोगी है और आशा है कि आने वाले पांच सालों में वो कई पायदान चढ़ कर 10वें स्थान पर आ सकता है.

व्यापार की अहमियत इस बात से भी ज़ाहिर हो रही है कि ओबामा के साथ 200 उच्च अधिकारी और कंपनी प्रमुख आ रहे है और उनके कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा आर्थिक हितों के मद्देनज़र तैयार हुआ है.

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन का कहना है “अमरीका भारत का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है और अमरीका को भारतीय निर्यात किसी और देश के मुक़ाबले सबसे तेज़ी से बढ़े है. दोनो देशों के बीच व्यापार लगभग संतुलित है और यहां तक कि ये संतुलन सेवा क्षेत्र में भी है जिसके बारे में ज़्यादा लोगों को पता नहीं है. हम इस बात को जानते है कि व्यापार में सुरक्षावादी नीतियां कारगर नहीं होती.”

'बैंगलोर को कहिए ना और बफैलो को कहिए हाँ'

पर भारत की चिंताएं इस बात से बढ़ी है कि अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा है कि बैंगलोर को कहिए ना और बफैलो को कहिए हाँ.

यानि सीधी सरल भाषा में अमरीका की नौकरियां अमरीका में रहे और भारत को आउटसोर्स ना हों.

फ़िर उन्होंने पेशेवरों को दिए जाने वाले काम के वीज़ा की फ़ीस में बढ़ोतरी कर दी, जो सिर्फ़ भारत पर नज़र रख कर नहीं की गई थी लेकिन जिसका भारत पर सीधा असर पड़ा.

ओबामा ने ये भी कहा कि उन कंपनियों को करों में फ़ायदा मिलता रहा है जो विदेशों में नौकरियां पैदा कर रही थीं. उन्होंने कहा, 'मैं उसे बदलना चाहता हूं'.

लेकिन भारतीय मूल के अमरीकी व्यापारी, केलिफ़ोर्निया स्थित अमृत इंकोरपोरेटेड के गुंजन बागला कहते है कि आउटसोर्सिंग एक हौवा नहीं बल्कि अमरीकियों के लिए भी फ़ायदे का सौदा है.

गुंजन बागला ये भी मानते है कि आउटसोर्सिंग पर ओबामा को भारत में कई सवालों के जवाब देने पड़ सकते है.

बागला कहते हैं, “आउटसोर्सिंग की कई परतें है. एक अमरीकी कंपनी जो आउटसोर्सिंग करती है उसे बाज़ार में बने रहने की ज़्यादा गुंजाइश होती है. जो कंपनी आउटसोर्सिंग का इस्तेमाल करती है वो जापानी या कोरियाई कंपनी जो आउटसोर्सिंग का इस्तेमाल नहीं कर रही उससे बेहतर हालत में होती है. हां ये भी सच है कि कुछ नौकरियाँ जाती हैं लेकिन कुल मिलाकर अमरीका के नौकरीपेशा लोगों को भारतीय अर्थव्यवस्था, जिसमें आउटसोरसिंग शामिल है से फ़ायदा होता है.”

मल्टी ब्रांड की रिटेल क्षेत्र पर अमरीका की नज़र

भारत और अमरीका एक दूसरे के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ा कर एक दूसरे के हुनर और क़ाबिलियत का फायदा उठा सकते है.

उद्योग और वाणिज्य कंपनियों के संगठन फ़िक्की के महासचिव डॉ अमित मित्रा कहते है,“भारत अमरीका को अपने उत्पादों की क़ीमतें कम करने की क्षमता देता है. आप सेलफ़ोन का उदाहरण लीजिए - युएसइंडिया आईबीएम की तकनीक इस्तेमाल करके एक सेंट प्रति मिनट की दर से भारत को कॉल बेच रहा है. तो ये उसका बड़ा निर्यात है.

अमित मित्रा आगे कहते हैं, "भारत अपने व्यापारियों के हुनर से उस उत्पाद की क़ीमत कम करता है. भारतीय व्यापारियों ने अमरीका में 372 कंपनियां खरीदी है, यानि हज़ारों नौकरियाँ पैदा की है. कई गांवों,शहरों का जीर्णोधार हो गया है. भारत अमरीका में दूसरा सबसे बड़ा निवेशक है. तो अगर ओबामा अमरीकियों के लिए नौकरियां चाहते है, तो भारत सही जगह है.”

अमरीकी व्यापारी चाहते है कि भारत सीधे विदेशी निवेश की सीमा सभी क्षेत्रों में बढ़ा कर 74 प्रतिशत कर दे. अमरीकी व्यापारी चाहते हैं कि भारत 'मल्टी ब्रांड' रिटेल क्षेत्र और क़ानून क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के लिए खोल दे. पर ये सब एसे क़दम है जहां सरकार को वामदलों और स्वदेशी के पैरोकारों का विरोध है.

प्रतिरक्षा सौदो के लिए अमरीका तत्पर है और कृषि क्षेत्र में भी उसकी दिल्चस्पी है.इसके अलावा उच्च तकनीक के आदान प्रदान बढ़ाने पर दोनो नेता ज़ोर देंगे.

और शायद ओबामा, अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिनकी वो बहुत इज़्जत भी करते है से तेज़ विकास दर और आर्थिक परेशानियों से देश को दूर करने के कुछ गुर भी सीख जाएं जो शायद साझा वक्तव्य या समझौतो से इस समय बराक ओबामा के लिए ज़्यादा ज़रुरी हो.

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