भारत और भारतीयों की पूछ

  • 20 नवंबर 2010
मनमोहन सिंह और बराक ओबामा
Image caption कई मुद्दों पर मतभेद के बावजूद अमरीका की दोनों पार्टियां भारत को लेकर लगभग एकमत हैं.

मैं अमरीका पहली बार 1987 में आया था और कुछ महीने रह कर दो-तीन राज्यों में घूमा था. तब इंटरनेट और इमेल का ज़माना नहीं था.

जब घर की याद आती थी तो अख़बारों में भारत संबंधित ख़बरें ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक जाता था लेकिन कभी-कभार अपने देश की ग़रीबी और किसानों की बदहाली पर कोई खबर छपी मिलती थी.

तब समय दूसरा था. अब समय है भारत का. अब भारत पर अमरीकी अख़बारों और टीवी पर कई ख़बरें होती हैं. भारत का नाम अमरीका में इज़्ज़त से लिया जाता है.

वॉशिंगटन में हमारे कुछ पाकिस्तानी दोस्त यह स्वीकार करते हैं की दोनों देशों को अमरीका में कितना अलग तरीके से देखा जाता है.

दिलचस्प बात ये है की भारत को यह सम्मान सभी पार्टियों ने दिया है,आम जनता ने भी दिया है.

उदाहरण के तौर पर इस बात पर गौर कीजिये.

भारत के साथ

चार नवम्बर को हुए मध्यावधि चुनाव के बाद कांग्रेस की प्रतिनिधि सभा में विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी को अष्पष्ट बहुमत मिला और इसके साथ ही अमरीकी राजनीति में एक ऐसे दौर की शुरुआत हुई जिस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी किसी भी एक विषय या मुद्दे पर सहमत नज़र नहीं आते.

मामला स्वास्थ्य कल्याण के बिल का हो या फिर टैक्स में अमीरों को दी गई छुट की अवधि बढाने का, दोनों पार्टियों में बिल्कुल सहमति नहीं है.राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए यह एक बड़ी दिक्कत की बात है.उन्हें कोई भी बिल पास कराने के लिए दोनों पक्षों को खुश रखना पड़ेगा.

Image caption अमरीका में भारत के प्रति नीति पर दोनों पार्टियां एकमत हैं.

लेकिन उन्हें भारत से रिश्ते के मुद्दे पर चिंता करने की ज़रुरत नहीं.यह कुछ गिने-चुने मुद्दों में से एक है जिस पर दोनों पार्टियों के बीच पूरी तरह से सहमती है.

जब बराक ओबामा भारत में भारत की संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् की सदस्यता की हिमायत कर रहे थे यहाँ वॉशिंगटन में विपक्ष के नेता जॉन मेकेंन भारत को एक परमाणु शक्ति स्वीकार करते हुए इसे अमरीका की बराबरी का दर्जा देने की ज़ोरदार सिफारिश कर रहे थे.

शायद ये वो जोश में बोल गए लेकिन उन्होंने कई और बातें होश में भी कीं. उन्होंने कहा अमरीका की दोनों पार्टियों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद है लेकिन भारत के मुद्दे पर पूरी सहमति है

शादी

अंग्रेजी में एक कहावत है "मैरिजज़ आर मेड इन हेवेन", यानी शादियाँ स्वर्ग में तय होती हैं. शायद अमरीकी समाज में यह कहावत अनावश्यक हो चुकी है.

पिव रिसर्च सेंटर नामक एक संस्था और टाइम मैगजीन ने कई अमरीकियों से बात कर के एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण बात जो निकल कर आई है वो ये कि अमरीका में परिवार बनाने के लिए शादी करना ज़रूरी नहीं है.

लगभग 30 प्रतिशत अमरीकी बच्चे या तो तलाक़शुदा माँ या बाप के साथ रहते हैं या फिर ग़ैर वैवाहित माता-पिता के साथ.

रिपोर्ट में कहा गया कि अमरीकी अब ये ज़रूरी नहीं समझते की बच्चे पैदा करने या परिवार शुरू करने के लिए शादी करना ज़रूरी है.

अब अमरीकी सरकार ने भी इस हक़ीक़त को मान लिया है और कहा जाता है कि सरकारी तौर पर परिवार की परिभाषा में परिवर्तन होने वाला है.

भारतीयों का बोलबाला

Image caption आईएमएफ़ और विश्व बैंक में क़रीब आठ सौ भारतीय काम करते हैं.

अमरीका के आईटी क्षेत्र में भारतीय मूल के लोगों के योगदान को विश्व भर में सराहा जाता है. ये भी अब आमतौर से जाना जाता है की भारतीय मूल के लोग अमरीकी प्रशासन में बड़े पदों पर बैठे हैं. और शायद ये भी लोगों को जानकारी होगी की दो अमरीकी राज्यों के राज्यपाल भी भारतीय मूल के हैं.

लेकिन शायद ये कम लोगों को मालूम है की विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं में भारत के लोगों ने अपना सिक्का जमाया हुआ है.

अगर आप वॉशिंगटन में इन बैंकों के मुख्यालय के बाहर और ख़ासतौर से इनके अन्दर जाएँ तो आपको ऐसा मालूम होगा आप मुंबई के किसी कॉर्पोरेट दफ्तर में पहुँच गए हैं.

मुझे इन संस्थाओं में पिछले पांच महीनों में कई बार जाने का मौका मिला और हर बार मुझे वहां जाने पर मुंबई की याद आई.

वहां के कुछ भारतीय मूल के अधिकारियों ने मुझे गर्व से बताया की विश्व बैंक और आईएमएफ़ की सभी संस्थाओं और दफ्तरों को लें तो भारत से आये लोगों की संख्या आठ सौ से अधिक होगी.

लेकिन यह कहते हुए वो ये भी बताना नहीं भूलते की यह संख्या पिछले कुछ महीनों में घटी है.

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