बंदूक को त्याग बना शांति का सिपाही

Image caption कश्मीरी होने के कारण नुकसान भी उठाना पड़ा लेकिन शांति के लिए काम करता रहूँगा.

एक समय में बंदूक थामने वाले हाथों ने अब शांति का संदेश फैलाने का ज़िम्मा उठाया है.

24 सिंतबर को मुंबई से अपनी यात्रा शुरू कर चुके कश्मीर के निवासी मोहम्मद अल्ताफ़ बट पूरे देश में शांति का पैगाम लिए घूम रहें हैं.

अपने अगले पड़ाव में राजस्थान पहुंचे मोहम्मद पैदल घूम-घूम कर शांति का संदेश देते हैं और अब तक कोई डेढ़ हजार किलोमीटर का सफ़र तय कर चुके है.

बट एक समय में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में प्रशिक्षण ले चुके है. लेकिन अब उन्होंने अमन की राह थामीं है.

कभी अल्ताफ के हाथों में बंदूक हुआ करती थी लेकिन अब वे शांति का परचम थामे गाँव-गाँव, बस्ती-बस्ती शांति की सदा बुलंद करते घूम रहे हैं.

अल्ताफ़ जब अपनी कहानी बताते है तो ऐसा लगता है कि किसी फिल्म का कथानक हो. इसमें हिंसा, तिलस्म और वितृष्णा सब कुछ है.

नुक़सान

वे कहते हैं, ''वो नासमझी का दौर था. मैंने आस-पास देखा लोग दुखी थे, लोग ज़िल्लत में जी रहे थे, मेरा युवा मन मुझे हथियारों की तरफ ले गया. मैं सरहद पार कर कश्मीर के उस हिस्से में चला गया, वहां अल उमर मुजाहिदीन के शिविर में प्रशिक्षण लिया. तीन महीने के बाद में कश्मीर लौट आया. फिर दो साल मैंने जेल में भी काटे.''

अल्ताफ़ अतीत में झांक कर कहते हैं,''मेरा मन ऐसी हिंसा से उचट गया. किसी भी बेगुनाह की जान लेना इस्लाम के ख़िलाफ़ है.''

अल्ताफ़ देश में कई जगह घूमे है. उनका कहना है, ''कई स्थानों पर मुझे काम के दौरान कश्मीरी होने के कारण बहुत ही नुक़सान उठाना पड़ा. इस नुक़सान के बावजूद मैं अमन के लिए काम करता रहूँगा.''

अल्ताफ़ ने इससे पहले दिल्ली और जैसलमेर में काम करने का प्रयास किया, लेकिन कश्मीरी होने के कारण उन्हें वहां भी बहुत परेशानी उठानी पड़ी.

उनका कहना था कि जहां भी उन्होंने पुलिस से मदद के लिए गुहार लगाई, निराश ही लौटना पड़ा. बल्कि उन पर उलटा शक किया गया.

अल्ताफ़ महात्मा गाँधी से बहुत प्रभावित है. अल्ताफ़ की दो छोटी बेटियाँ हैं.

वे कहते हैं, ''ये राह कठिन ज़रुर है. लेकिन मैं कश्मीर में मारा जाता हूँ तो मुझे कोई भी शांति का सिपाही कह कर नहीं पुकारता, चाहे मैं अपने परिवार को संभाल नहीं पा रहा हूँ, मुझे गँवारा है, इस राह पर जाते हुए अगर मेरी जान भी कुर्बान हो जाए तो मेरी पत्नी और बेटियाँ फ़ख़्र से कहेंगीं कि अल्ताफ़ ने अमन के लिए ख़ुद को बलिदान कर दिया.

मदद

इस यात्रा में अल्ताफ़ का कहीं स्वागत किया गया, कहीं उनसे सवाल पूछे गए, तो कहीं लोगो ने ताने भी कसे.

जयपुर में वह नौजवानों से मिले और अपनी यात्रा का फलसफ़ा समझाया. नौजवानों की भीड़ में से एक सक्षम खंडेलवाल कहने लगे कि अल्ताफ़ को सुनकर उन्हें कश्मीर का मसला समझने में मदद मिली है.

सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि ऐसे मिलने-जुलने से एक दूसरे का मंतव्य समझने में बड़ी सहायता मिलती है.

गोला बारूद और बंदूक में बहुत ताक़त है. हथियार की ताक़त से किला तो फ़तह किया जा सकता है. लेकिन दिल नहीं. इसीलिए अल्ताफ़ के एक हाथ में शांति का परचा है तो दूसरे में अमन का परचम.

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