कानकुन में जलवायु पर समझौता

दो महीने तक चली वार्ता के बाद कानकुन में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर देशों में सहमति बन गई है. इसमें विकासशील देशों की मदद के लिए ग्रीन क्लाइमेट फंड बनाने की बात शामिल है.

मेक्सिको में हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में मेक्सिको ने समझौते का मसौदा पेश किया जिसे बोलिविया की आपत्ति के बावजूद अनुमोदित कर दिया गया.

मसौदे में कहा गया है कि कार्बन उत्सर्जन और कम करने की ज़रूरत है लेकिन इसे हासिल के लिए किसी कार्यप्रणाली या तरीके के बारे में नहीं बताया गया है.

भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि कानकुन सम्मेलन ने ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा कम करने को योजना को फिर जीवित कर दिया है.

उन्होंने कहा, “इस पूरी प्रकिया को लेकर अब भी कई शंकाएँ हैं जिन्हें दूर करना होगा. लेकिन हम पटरी पर लौट आए हैं. कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं, कई मुद्दों पर देशों ने वचनबद्धता जताई है, मुझे लगता है कि जलवायु परिवर्तन के मसले से निपटने की ओर ये बड़ा क़दम है.”

वार्ता के अंतिम हफ़्ते में कुछ देशों ने क्योटो संधि का विरोध किया था जिस वजह से सहमति नहीं बन पा रही थी लेकिन अंतत कूटनयिक नतीजे तक पहुंचने में सफल रहे.

प्रावधान

जापान, चीन और अमरीका ने सबसे ज़्यादा विरोध जताया था लेकिन जब उन्होंने मसौदे को अपनी मंज़ूरी दी तो इन्हीं देशों के भाषण को प्रतिनिधियों ने सराहा भी.

विशेष ग्रीन क्लाइमेट फ़ंड का मकसद है कि 2020 तक 100 अरब डॉलर जुटाकर ग़रीब देशों को दिए जाएँ ताकि ये देश जलवायु परिवर्तन के नतीजों से निपट सकें और कम कार्बन उत्सर्जन की ओर बढ़ सकें.

पेड़ों की कटाई रोकने के लिए क़दमों का प्रावधान है और जलवायु संरक्षण योजना बनाने वाले देशों की मदद एक विशेष समिति करेगी. साथ ही उत्सर्जन में कमी पर नज़र भी रखी जाएगी.

लेकिन विकासशील देशों में उत्सर्जन कटौती करने के क़दमों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी तभी हो सकेगी जब कटौती के लिए पश्चिमी देश पैसा देंगे.

इस बात से चीन संतुष्ट नज़र आया जो पश्चिमी निगरानी को लेकर आशंकित था.

बाध्यकारी है या नहीं?

वैसे दो हफ़्ते से चल रहे कानकुन सम्मेलन के आख़िरी दिन प्रतिनिधियों को ज़्यादा उम्मीद नहीं थी. लेकिन पर्दे के पीछे हुई कूटनीति रंग लाई जिससे एक ऐसा मसौदा तैयार हो सका जो सबको मंज़ूर था.

रूस और जापान मसौदे में अपने हित से जुड़ी बात डलवाने में सफल रहे हैं. और वो ये कि अगर क्योटो संधि की समयसीमा बढ़ाई जाती है तो उत्सर्जन में बाध्यकारी कटौती से वे संभावित रूप से पीछे हट सकते हैं.

वहीं इस मसौदे में कहा गया है कि क्योटो संधि कारगार साबित होगी जो विकासशील देश चाहते थे.बोलिविया को न सिर्फ़ कानकुन मसौदे पर ऐतराज़ था बल्कि उसका ये भी कहना था कि कुछ देशों के गुटों के बीच निजी स्तर पर हुई बातचीत पर भी उसे आपत्ति है.

बीबीसी संवाददाता रिचर्ड ब्लैक का कहना है कि इस समझौते में वो सब बातें शामिल नहीं है जो कई देश पिछले साल कोपनहेगन सम्मेलन में चाहते थे.

लेकिन ये सवाल अब भी बाकी है कि क्या कानकुन में उठाए जाने वाले क़दम देशों पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होंगे या नहीं.

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