एक कारवां जो अछूत नज़र आया

Image caption भारत सरकार से वाघा चौकी पार करने की इजाज़त न मिलने पर सरकार के खिलाफ एक छोटा प्रदर्शन.

भारत से फ़लस्तीन तक का लंबा सफ़र जब सड़क के रास्ते तय करने की ख़बर मिली तो मुझे लगा कि इस पर जाना ही है.

एक मक़सद था फ़लस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता लेकर जाना, दूसरा, उन तमाम देशों से होकर गुज़रना जहां मैं कभी नहीं गया था.

ये ख़बर मुझे मिली मेरे दोस्त और 'भोजन के अधिकार’ मोर्चे पर सक्रिय भारत के एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता बिराज पटनायक से. साथ ही मिला सफ़र में उनका साथ भी.

लेकिन पहले दिन से लेकर पूरे पांच हफ्तों तक यह एहसास मुझे नहीं था कि ये सफ़र कैसी-कैसी विसंगतियों, विरोधाभासों और विविधताओं से भरा रहेगा.

घर-दफ़्तर से करीब चालीस दिन दूर रहने की कीमत पर भी मुझे आज यही लगता है कि एशिया से गज़ा यह कारवां जिसने नहीं जिया, उसने शायद जिंदगी का एक अनोखा मौका खो दिया.

बहुत लोगों का मानना है कि इसराइल की मार के आगे दम तोड़ती पीढिय़ों वाला फ़लस्तीन दुनिया में बेइंसाफी की एक बहुत बड़ी मिसाल है. अपने घर से बेदखल फ़लस्तीनियों को गांधी और नेहरू की हमदर्दी मिली लेकिन आज दुनिया की बाज़ारू बाज़ार व्यवस्था में अमरीका-इसराइल एक अधिक समझदार कारोबारी भागीदार लगने लगे हैं -- नेहरू और गांधी के देश को भी.

नतीजा यह हुआ कि महीनों पहले से चल रही तैयारी के बाद भी भारत सरकार का रूख इस कारवां के लिए अड़ियल और बेरूखी का ही रहा.

विदेश नीति

जिन विसंगतियों और विरोधाभासों की मैंने बात की, उसकी एक बड़ी मिसाल भारत की विदेश नीति रही.

दो दिसंबर को कारवां दिल्ली के राजघाट से कई देशों से आए 50 से अधिक लोगों के साथ रवाना तो कर दिया गया लेकिन पाकिस्तान की सरकार का वीज़ा एक दिन बाद मिला. उसे लेकर अमृतसर के आगे वाघा सरहद-चौकी तक पहुंचे तो पता लगा कि भारत सरकार वहां से सरहद पार करने की इजाज़त नहीं दे रही.

Image caption राजघाट से कारवां को रवाना करने कई नामीगिरामी लोग आए.

वाघा चौकी पर दिन भर पड़े रहकर कारवां भारत सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी करता लौट गया. दिल्ली पहुंचने के पहले ही रास्ते में लोग रूके क्योंकि भारत सरकार के कई लोगों से सामाजिक मोर्चे के कई लोगों ने दखल देकर इस इजाज़त की सिफारिश की थी.

एक दिन बर्बाद करके, किसी तरह दिल्ली ने यह इजाज़त दी तो कारवां के पास पाकिस्तान के लाहौर में बिताने के लिए एक पूरा दिन भी नहीं बचा था.

पाकिस्तान सरकार ने कारवां के एक तिहाई लोगों को वीज़ा से मना कर दिया था, और यह इजाज़त भी नहीं दी थी कि वहां से गुज़र कर कारवां ईरान जाए. इसलिए महज लाहौर जाने की इजाज़त दो तिहाई कारवां को मिली, और वहां के लगभग प्रतीकात्मक दौरे के बाद कारवां दिल्ली लौट गया, हवाई रास्ते से ईरान जाने के लिए.

दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देश, शायद पूरी मुस्लिम बिरादरी ज़ख्मी, बेघर फ़लस्तीनियों के साथ हैं. लेकिन पाकिस्तान का रुख़ फ़लस्तीन के लिए बेरूखी का रहा.

'फ़लस्तीन नहीं कश्मीर'

कारवां के लोग जब दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलकर ईरान तक जाने देने के लिए रास्ते की इजाज़त की गुजारिश कर रहे थे, तो उन्होंने खुलकर कहा, “आपके लिए फ़लस्तीन की आज़ादी का मुद्दा है, हमारे लिए तो कश्मीर मुद्दा है.”

लेकिन एक दिक्कत और थी.

पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान के रास्ते से कारवां का ईरान जाना तय किया गया था. उस बलूचिस्तान में भी आज़ादी के लिए बागी तेवरों के साथ हिंसा जारी है और भारत पर यह तोहमत भी लगती है कि वहां की बदअमनी के पीछे उसीका हाथ है.

पाक उच्चायोग का यह भी कहना था कि कारवां के इतने लंबे सड़क-सफर की सुरक्षा का इंतज़ाम मुमकिन नहीं है.

कारवां की शुरूआत में ही भारत और पाकिस्तान की सरकारों से वीज़ा और इजाज़त के मोर्चे पर जूझने से यह साफ हो गया कि जिन देशों के लिए कोई बीस बरस पहले तक इसराइल अछूत था, उन देशों के लिए आज इसराइल का क्या दर्जा है.

गांधी-नेहरू का भारत और इस्लामी पाकिस्तान, इन दोनों के लिए आज यह कारवां अछूत था जो फ़लस्तीनियों के लिए इंसानी मदद की शक्ल में मेडिकल सामान लेकर जा रहा था.

कारवां लौट भी आया, लेकिन भारत सरकार ने इन सामानों को देश के बाहर ही नहीं जाने दिया. सरकार की इजाज़त न मिलने से 25 लाख रूपए की जांच-मशीनें दिल्ली में पड़ी रह गईं और इसकी राह देखते कारवां की बसें सर्द देशों में रात-दिन सफ़र करती रहीं.

विश्व बाज़ार व्यवस्था में फ़लीस्तीनियों के लिए ऐतिहासिक हमदर्दी और एकजुटता किस तरह हवा हो गई है यह कारवां के पहले देश भारत-पाक में भी समझ आया और आखिरी देश मिस्र में भी.

लेकिन ये विसंगतियां और विरोधाभास सरकारों की नीतियों तक ही सीमित नहीं थीं, खुद कारवां के भीतर भी ऐसे कई टकराव थे.

(बाकी अगली किस्तों में).

(लेखक छत्तीसगढ़ अख़बार के संपादक हैं.इस स्तंभ में व्यक्त किए गए विचार लेखक के हैं बीबीसी के नहीं).

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