ब्रिटिश मुसलमानों को लेकर चिंता

  • 20 जनवरी 2011
सईदा वारसी
Image caption बैरोनेस सईदा वारसी मुस्लमानों के प्रति पूर्वाग्रह से चिंतित हैं

कंजरवेटिव पार्टी की एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है कि ब्रिटेन में मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह आम बात है और आज के ब्रिटेन में इसे सामाजिक मान्यता भी मिल गई है.

सईदा वारसी कंज़रवेटिव पार्टी की सह अध्यक्ष हैं और वे कहती हैं कि मुसलमानों को उदारवादी या कट्टरपंथी के रुप में बाँटना ख़तरे से खाली नहीं.

ब्रिटेन की कैबिनेट में सईदा वारसी पहली मुस्लिम हैं और कहती हैं कि ऐसे लेबल मुसलमानों के बारे में ग़लतफ़हमी बढ़ाते हैं.

लेस्टर विश्वविद्यालय में गुरुवार को वो यही बात अपने भाषण में रखने वाली हैं. उनका ये भी आरोप है कि मीडिया इस्लाम पर सतही बहस चलाता है.

बैरोनेस वारसी अपने भाषण में कहेंगी कि ब्रिटेन में मुसलमानों के बारे में पूर्वाग्रह को लोग सामान्य और ग़ैर विवादास्पद मानने लगे हैं. वे समाज में अपने पद का इस्तेमाल ‘धार्मिक असहिष्णुता के ख़िलाफ़ मुसलमानों की लड़ाई’ में करेंगीं.

डेली टेलीग्राफ़ अखबार में उनके भाषण के अंश छपे हैं. इसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि ब्रिटेन में इस्लाम धर्म को मानने वालों के प्रति सहनशीलता में जो कमी नज़र आ रही है उसके पीछे कारण, उनके शब्दों में, “ कुछ तबक़ो में, ख़ासकर मीडिया में आस्था पर होने वाली सतही चर्चा है.”

पिछले साल ब्रिटेन गए कैथोलिक धर्म गुरु पोप बैनेडिक्ट के सामने भी बढ़ते हुए 'इस्लामोफ़ोबिया' या इस्लाम के डर की चर्चा की थी. उन्होंने पोप से, “यूरोप और उसके मुस्लिम नागरिकों के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने की मांग की थी.”

समाज से शिकायत

बीबीसी के धार्मिक मामलों के संवाददाता रोबर्ट पिगौट का कहना है कि बैरोनेस वारसी वो बात सार्वजनिक रुप से कहेंगी जिसकी मुसलमान निजी ज़िंदगियों में अक्सर शिकायत करते हैं.

उनकी शिकायत है कि मुसलमानों के प्रति जो पूर्वाग्रह समाज में है उसकी जितनी आलोचना होनी चाहिए, नहीं होती.

संवाददाता का कहना है कि बैरोनेस पहले भी ये मामला उठाती रहीं हैं.

उन्होंने वर्ष 2009 में कंज़रवेटिव पार्टी के सम्मेलन में भी कहा था, "मुसलमानों से घृणा सामाजिक रुप से स्वीकार की जाती है और मुसलमानों पर टीका टिप्पणी करना अखबार बेचने में मदद करते हैं."

स्कूल में बच्चे कहते हैं, “ हमारे घर के पड़ोस में मुस्लिम परिवार है पर वो ख़राब तो नहीं है. ”

उनका कहना है, “सड़क पर बुर्क़ा पहने महिला को देख कर सड़क चलते लोग सोचते हैं –या तो वो महिला शोषित है या फिर कोई राजनीतिक वक्तव्य देना चाह रही है.”

उनका कहना है कि कुछ लोगों के आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से इस्लाम मानने वाले सभी लोगों की भर्त्सना करना ग़लत है. पर साथ ही वो मुस्लिम समाज से भी कहेंगी कि वे भी ऐसे लोगों को खुले रुप से अस्वीकार करें.

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