चीनी दिमाग़ और अमरीकी सपना

हु जिनताओ
Image caption हु जिनताओ की अमरीकी दौरे पर चीन के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठे.

चीन के राष्ट्रपति हु जिंताओ अपना अमरीका का दौरा पूरा कर के वापस देश लौट गए. उनके दौरे पर रिपोर्टिंग करने लंदन से हमारे चीनी सेवा के एक साथी आए थे.

उन्होंने कहा मैं वाशिंगटन में जहाँ भी जाता हूँ 'मेड इन चाइना' सामान ही देखने को मिलता है. उनको तलाश थी एक ऐसी दूकान की जहां चीनी सामान के बजाये अमरीकी उत्पाद मिलता हो.

शहर के बड़े-छोटे बाज़ार में तलाश हुई एक ऐसी दुकान की जहाँ चीनी सामान न बिकता हो लेकिन ये मुश्किल काम मालूम होता था. आख़िर शहर के एक महंगे बाज़ार में एक ऐसी दूकान के बारे में पता चला तो हमारे चीनी सेवा के साथी वहां गए और एक तीस साल के चीनी नागरिक से मिले जो सात साल पहले चीन से अपना भविष्य संवारने अमरीका आए थे.

उनकी दूकान में केवल अमरीकी सामान ही बिकता है.

इस चीनी दुकानदार ने मेरे चीनी साथी को अपने व्यापार के बारे में बताया, "जब मैं यहाँ आया तो आपकी तरह मैंने भी हर जगह चीनी सामान बिकते देखा. तब मेरे दिमाग में आया कि क्यूँ ना मैं एक ऐसी दूकान खोलूं जहाँ केवल अमरीकी सामान बेचा जाए? यहां से चीनी पर्यटक अमरीकी सामान ख़रीदना चाहते हैं ताकि वे उसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को तोहफ़े में दे सकें."

सात साल पहले खोली गई ये दूकान अमरीका से अधिक चीन में लोकप्रिय है. चीनी पर्यटक उनकी दूकान में हमेशा आते रहते हैं और सात साल बाद यह चीनी दूकानदार अब एक अमीर आदमी बन चूका है.

इसे कहते हैं चीनी दिमाग़. तभी तो चीन अमरीका को लगभग 350 अरब डॉलर का सामान हर साल बेचता है जबकि अमरीका से केवल 90 अरब डॉलर का सामान ख़रीदता है.

मानवाधिकार और चीन

चीन के राष्ट्रपति को अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर सभी बड़े नेताओं ने मानवाधिकार का पाठ पढाया. चीनी राष्ट्रपति ने भी कहा कि वे मानवाधिकार के रिकॉर्ड को बेहतर करेंगे.

लेकिन यहां कई बुद्धिजीवियों की राय में ये सबकुछ दिखावा था. इसके दो कारण हैं. पहला चीन और अमरीका के बीच व्यापार और दूसरा अमरीका पर चीन का कर्ज़ा. इन दोनों देशों के बीच व्यापार की कहानी कमाल की सफल कहानी है. तीस वर्ष पहले इन दोनों के बीच रिश्तों के सुधरने के बाद व्यापार के मैदान में दोनों के बीच केवल 100 मिलियन डॉलर का सौदा होता था.

चीन का दम

आज 420 अरब डालर से ऊपर है. अगर चीन अमरीका को सामान बेचना बंद कर दे तो अमरीकी अर्थव्यवस्था में भूचाल आ जाएगा. इन दोनों देशों के बीच इस विशाल व्यापारिक रिश्ते को अगर ठीक से समझना हो तो भारत की मिसाल लीजिये.

भारत और अमरीका के बीच सालाना व्यापार केवल 45 अरब डॉलर का है. जबकि चीन और भारत के बीच 55 अरब डॉलर का.

भारत को अमरीका में चीन के मुकाम तक पहुँचने में सालों लग सकते हैं. दूसरी तरफ चीन को पता है कि अमरीका कर्ज़ में डूबा हुआ एक देश है. अरबों डालर के क़र्ज़ का एक भारी हिस्सा अमरीका ने चीन से लिया हुआ है.

अगर आप ने किसी आदमी से भारी मात्र में क़र्ज़ लिया है तो क्या उसके ख़िलाफ़ आप कुछ कहने के काबिल होंगे? इसीलिए चीनी नेताओं को अमरीका के पाठ की ज़्यादा परवाह नहीं है.

अमरीकी सपना

Image caption फ़ेसबुक जैसा आइडिया चीन जैसे मुल्क़ में संभव नहीं है.

बात अगर अमरीका और चीन के व्यापार की छिड़ी है तो ये कहना भी उचित होगा की अमरीका में आप एक नए आइडिया से अरबपति बन सकते हैं जो शायद चीन में संभव न हो.

उदाहरण कई हैं. अब फ़ेसबुक को ही लीजिये. क्या यह सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट चीन में संभव थी? वहाँ आम नागरिकों को खुलकर अपनी बात सार्वजनिक रूप से कहने की आज़ादी है? नहीं.

फ़ेसबुक कॉलेज के कुछ छात्रों के दिमाग की उपज थी. सात साल पहले यह इसके संस्थापक मार्क ज़करबर्ग और उनके साथियों के जान पहचान और रिश्तेदारों के बीच आदान प्रदान करने के केवल एक माध्यम के रूप में शुरू किया गया था.

आज इस कंपनी की क़ीमत 50 अरब डॉलर आंकी जा रही है. इस तरह की सफलताएं केवल अमरीका या दूसरे कामयाब लोकतंत्र में ही देखने को मिलती हैं.

भारत भी इस मैदान में चीन से आगे है.

धीरूभाई अम्बानी 1959 तक एक पेट्रोल पम्प में नौकर थे. जब 2002 में उनका देहांत हुआ तो वे डॉलर अरबपति थे.

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