'फ़लस्तीनी वार्ताकार अवैध कब्ज़ा बर्दाश्त करने को तैयार थे'

  • 24 जनवरी 2011
नई यहूदी बस्तियाँ

अरबी के समाचार नेटवर्क अल जज़ीरा ने मध्य पूर्व शांति वार्ता से संबंधित सैकड़ों लीक हुए दस्तावेज़ छापने का दावा किया है जिनमें मध्य पूर्व शांति वार्ता से संबंधित ख़ासी जानकारी है.

बीबीसी ने दस्तावेज़ों की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं की है.

अल जज़ीरा का कहना है कि इन दस्तेवेज़ों से पता चलता है कि वर्ष 2008 में फ़लस्तीनी वार्ताकार गुप्त तौर पर पूर्वी येरुशलम में इसराइल के अवैध कब्ज़े को बनाए रखने की अनुमति देने के लिए सहमत हो गए थे.

अल जज़ीरा का कहना है कि दस्तावेज़ों में फ़लस्तीनियों की पिछले दस साल में इसराइल और अमरीका के साथ हुई बातचीत का गुप्त रिकॉर्ड है जो अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है.

दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता पर कई हफ़्तों से विराम लगा हुआ है और सार्वजनिक तौर पर इसका कारण एक समय फ़लस्तीनियों की रही ज़मीन पर यहूदी बस्तियाँ बनाने पर रोक लगाने के इनकार करना बताया गया है.

'समझौता हो तो चाहे कब्ज़ा बरक़रार रहे'

बीबीसी के मध्यपूर्व संवाददाता वायर डेविस के अनुसार इन दस्तावेज़ों के अनुसार अनौपचारिक तौर पर फ़लस्तीनी नेता इस बात के लिए तैयार थे कि यदि इसराइल के साथ समझौता हो जाता है तो वर्ष 1967 से इसराइल ने जिस ज़मीन पर कब्ज़ा किया हुआ है, उसमें से ख़ासी ज़मीन चाहे उसी के कब्ज़े में रहे.

इसमें से सबसे ज़्यादा विवादास्पद क्षेत्र येरुशलम का है जिस पर दोनों इसराइली और फ़लस्तीनी अपनी राजधानी के तौर पर दावा करते हैं.

लेकिन इन दस्तावेज़ों के मुताबिक फ़लस्तीनी वार्ताकार उन संवेदनशील मुद्दों पर भी बात करने को तैयार थे जिन पर तब तक माना जाता था कि कोई बातचीत हो ही नहीं सकती. इनमें पवित्र टेंपल माउंट या हरम-ए-शरीफ़ तक पहुँचने का रास्ता शामिल था.

पिछले कई वर्षों से वही फ़लस्तीनी नेता इसराइली और अमरीकी वार्ताकारों से बातचीत करते आए हैं लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है.

'झूठ हैं ये दस्तावेज़'

फ़लस्तीनियों में इसके कारण काफ़ी निराशा है और पूर्वी येरुशलम जैसे विवादित इलाक़ों में ये निराशा बहुत ज़्यादा है.

वहाँ लोग इसे अपने नेताओं की विफलता और इसराइल रुख़ को कब्ज़ा बढ़ाने की नीति के तौर पर देखते हैं और इन दस्तावेज़ों से उनकी ये धारणाएँ और पुख़्ता होंगी.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि ये दस्तावेज़ फ़लस्तीनियों की ओर से आए हैं और इसका मक़सद महमूद अब्बास की छवि को धूमिल करना है.

इस बीच फ़लस्तीन और इसराइल के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले साएब इरेकात ने इन दस्तावेज़ों की वैधता पर सवाल उठाते हुए इन्हें झूठा करार दिया है.

उन्होंने कहा, ''अगर इस तरह की पेशकश की गई थी तो इसराइल ने उसे स्वीकार क्यों नहीं किया और शांति प्रस्ताव पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए. ''

उधर इसराइली संसद के एक सदस्य हनीन ज़ोयाबी ने कहा है कि इन दस्तावेज़ों की जानकारियों ने फ़लस्तीनी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले उन लोगों पर सवाल उठाया है जो खुद को उनका पैरोकार कहते हैं.

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